Podcast: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएं पिछड़ा आदमी और सूरज को नही डूबने दूंगा | sarveshwar dayal saxena: three poem

0
2


दोस्तो हिन्दी लेखन की दुनिया में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जाना-माना नाम हैं. प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार और संपादक रहे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सितंबर में ही जन्मे और इसी माह में उन्होंने दुनिया को अलविदा भी कहा. उनकी कविताएं नश्तर भी हैं, आईना भी और ज़ख्मों पर नमक भी. न्यूज18 हिन्दी के आज के पॉडकास्ट में मैं पूजा प्रसाद आपके लिए लाई हूं उनकी तीन चुनिंदा कविताएं…

उनकी पहली कविता का शीर्षक है- पिछड़ा आदमी

जब सब बोलते थे
वह चुप रहता था
जब सब चलते थे
वह पीछे हो जाता था,
जब सब खाने पर टूटते थे
वह अलग बैठा टूंगता रहता था
जब सब निढाल हो सो जाते थे
वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
लेकिन जब गोली चली
तब सबसे पहले
वही मारा गया.
उनकी दूसरी कविता है- लू शुन और चिड़ियां
अपने बचपन में मैं लू शुन को अपने गांव की अमराइयों में घूमते, खलिहानों में बूढ़ों के साथ बतियाते, चिलम पीते और तैयार होते खेतों में जवानों के साथ खेलते देखता था. अव वह अक्सर घने जंगलों में घूमते मिल जाते हैं.

‘आप यहां?’
’हां, इस जंगल की चिड़ियों ने मुझे रोक लिया है.’
’चिड़ियों ने?’
’इस जंगल में गोलियां चलती हैं. उनकी आवाजों से वे घबरा गयी हैं.’
’क्या कोई शिकारी उनके पीछे पड़ा है?’
’शिकारियों की अब चिड़ियों में दिलचस्पी नहीं रही.’
’यह तो बहुत अच्छी बात है. फिर तो उन्हें कोई घबराहट नहीं होनी चाहिए.’
’घबराहट है न… गोलियों की आवाजें जो आती हैं. वह भरभराकर उड़ती हैं. सारे जंगल पर वे शामियाने की तरह तन जाती हैं. फिर जब लौटती हैं और पेड़ों पर उतरती हैं तो दहशत से भरी होती हैं.’
’क्यों?’
’वे कहती हैं वहां अक्सर पेड़ों में बंधी लाशें मिलती हैं. वे इस डर से सहमी रहती हैं कि कहीं जिस पेड़ से वे उतर रही हैं उनसे बंधी कोई लाश न हो. बंधी हुई लाशवाला पेड़, पेड़ नहीं रह जाता, न उनकी पत्तियां, पत्तियां रह जाती हैं, वह ऐसा मानती हैं. इन पेड़ों से लपटें निकलती होती हैं और पत्तियां अंगारों-सी धधकती रहती हैं. उन पर वह बैठ नहीं पातीं, न बसेरा ले पाती हैं. वह डर रही हैं कि कहीं एक दिन सारा जंगल जलने न लगे.’
’चिड़ियां इन लाशों को पहचानती हैं?’
’नहीं, इन लाशों को कोई नहीं पहचानता.’
’क्या ये बहुत साफ-सुथरे, मोटे-ताजे लोग होते हैं?’
’नहीं, अक्सर कमजोर और फटेहाल. लेकिन निडर और साहसी. ये पेड़ों और चिड़ियों को प्यार करते हैं और जंगल को स्वर्ग बनाने की कल्पना से भरे होते हैं.’
’आप क्या करेंगे?’
’मैं काफी कुछ चिड़ियों की भाषा समझ गया हूं. उन्हें समझा रहा हूं कि वे उन बन्दूकवालों पर टूट पड़ें, जो आदमी को लाकर पेड़ों से बांधकर गोली मारते हैं. अगर बंधे आदमी पर गोली चलाने से पहले ही वे टूट पड़ें तो यह नौबत नहीं आयेगी.’
’लेकिन बन्दूक उन पर भी उठ सकती है.’
’किसी भी बन्दूक में इतनी गोलियां नहीं होतीं जो करोड़ों का सफाया कर दें. फिर एक साथ टूटने पर बन्दूक थमे हाथ कांपने लगते हैं. वह छूटकर गिर जाती है. मैं यहां चिड़ियों को यही सिखा रहा हूं. काफी चिड़ियां बात समझ गयी हैं. पर इस जंगल में तरह-तरह की चिड़ियां है. तरह-तरह की उनकी भाषा है. तरह-तरह के उनके रंग हैं, अलग-अलग उनकी बोलियां हैं. सबको समझने में कुछ देर लग रही है. पर जल्दी ही मैं हर एक की आदत, हर एक की भाषा समझ जाऊंगा फिर उन्हें समझा सकूंगा. सबको गोलबन्द कर सकूंगा और भयमुक्त भी.’

शाम हो चुकी थी. मैं अंधेरे जंगल से बाहर आने के लिए उतावला था. मैंने उनसे जल्दी-जल्दी विदा ली और जंगल के बाहर कदम बढ़ाने लगा. वह और भीतर चले जा रहे थे और तमाम चिड़ियां उनको घेरने लग गयी थीं. घेरती जा रही थीं. किसी एक चिड़िया ने भी मेरी ओर नहीं देखा.

इधर एक अरसे से मैं जंगलों की तरफ नहीं गया हूं, लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूं, लू शुन वहां हैं और अब वह उनकी सबकी भाषा अच्छी तरह जान गये होंगे. कुछ ही दिनों बाद जंगलों में गोलियां चलनी बन्द हो जायेंगी और चिड़ियां निर्भय चहचहाने-गाने लगेंगी.

उनकी यह तीसरी कविता आपके रोम-रोम को कपकंपा देगी.. इसका शीर्षक है- सूरज को नही डूबने दूंगा

अब मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा
देखो मैंने कंधे चौड़े कर लिये हैं
मुट्ठियां मजबूत कर ली हैं
और ढलान पर एड़ियां जमाकर
खड़ा होना मैंने सीख लिया है.

घबराओ मत
मैं क्षितिज पर जा रहा हूं
सूरज ठीक जब पहाड़ी से लुढ़कने लगेगा
मैं कंधे अड़ा दूंगा
देखना वह वहीं ठहरा होगा

अब मैं सूरज को नही डूबने दूंगा
मैंने सुना है उसके रथ में तुम हो
तुम्हें मैं उतार लाना चाहता हूं
तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो
तुम जो साहस की मूर्ति हो
तुम जो धरती का सुख हो
तुम जो कालातीत प्यार हो
तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो
तुम जो मेरी चेतना का विस्तार हो
तुम्हें मैं उस रथ से उतार लाना चाहता हूं।

रथ के घोड़े
आग उगलते रहें
अब पहिये टस से मस नही होंगे
मैंने अपने कंधे चौड़े कर लिये है

कौन रोकेगा तुम्हें
मैंने धरती बड़ी कर ली है
अन्न की सुनहरी बालियों से
मैं तुम्हें सजाऊंगा
मैंने सीना खोल लिया है
प्यार के गीतों में मैं तुम्हे गाऊंगा
मैंने दृष्टि बड़ी कर ली है
हर आंखों में तुम्हें सपनों सा फहराऊंगा।

सूरज जायेगा भी तो कहां
उसे यहीं रहना होगा
यहीं हमारी सांसों में
हमारी रगों में
हमारे संकल्पों में
हमारे रतजगों में
तुम उदास मत होओ
अब मैं किसी भी सूरज को
नहीं डूबने दूंगा।





Source link

Advertisement

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here