Podcast: दुष्यंत कुमार की 5 ग़ज़लें- मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूंं वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूंं… | dushyant kumar ghazal peer parvat see, tu kisi rail see gujarti hai podcast by pooja prasad

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न्यूज18 हिन्दी के आज के पॉडकास्ट (Podcast) में आज हम चलेंगे हिन्दी ग़ज़लों (Ghazal) की दुनिया में. हिन्दी ग़ज़ल (Hindi Ghazal) की चर्चा जब भी होगी, वह चर्चा दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) के बिना अधूरी रहेगी. कहना चाहिए कि दुष्यंत कुमार ही वह शख्स थे जिन्होंने बताया कि ग़ज़लें सुर, सुरा और सुन्दरी से ऊपर हैं. उन्होंने यह भी दिखाया क‍ि हिंदी में ग़ज़लें जितनी रुमानी और क़ातिल हो सकती हैं, उतनी ही पॉलिटिकल और मारक भी. उनकी यह ग़ज़ल देखिए-

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है

आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो

इस अंंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम

तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके

जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूंं

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं, “दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमाइंदगी करती हैं.’ दुष्यंत कुमार की इस ग़ज़ल में वह नुमाइंदगी देख सकते हैं आप-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी

शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांंव में

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

उनका पूरा नाम था दुष्यंत कुमार त्यागी. शुरुआत में वह ‘परेदसी’ नाम से लेखन करते थे. उत्तर प्रदेश के बिजनौर में 1 सितंबर, 1933 को जन्मे और 20 सितंबर, 1975 को उन्होंने अंतिम सांस ली. भले ही उनकी कालजयी ग़ज़लें हमारे ज़ेहन में गूंजती रहती हों, लेकिन उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें सूर्य का स्वागत, जलते हुए वन का बसंत, आवाजों के घेरे, आंगन में एक वृक्ष, छोटे-छोटे सवाल, दुहरी जिंदगी शामिल हैं. ‘एक कंठ विषपायी’ नाम से काव्य नाटक भी लिखा. लुघकथा संग्रहण ‘मन के कोण’ भी लिखा. उनका सुप्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह है ‘साये में धूप’ जो बेहद लोकप्रिय हुआ. उनकी कई ग़ज़लें फिल्मों, नाटकों में इस्तेमाल हुईं और जन आंदोलनों में जन की आवाज़ बनीं. उनकी कई ग़ज़लें प्रेम की नुमाइंदगी भी करती हैं, सुनिए प्रेम में पगी उनकी यह ग़ज़ल-

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूंं

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूंं

एक जंगल है तेरी आंंखों में

मैं जहांं राह भूल जाता हूंं

तू किसी रेल-सी गुज़रती है

मैं किसी पुल-सा थरथराता हूंं

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है

मैं अगर रोशनी में आता हूंं

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे

और ज़्यादा वज़न उठाता हूंं

मैं तुझे भूलने की कोशिश में

आज कितने क़रीब पाता हूंं

कौन ये फ़ासला निभाएगा

मैं फ़रिश्ता हूंं सच बताता हूंं

दुष्यंत साहब और कवि हरिवंश राय बच्चन के बीच प्रगाढ़ दोस्ती थी. 1975 में अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ देखने के बाद दुष्यंत कुमार ने उन्हें एक खत लिखा. इसमें उन्होंने लिखा, ‘मुझे क्या पता था कि उनकी एक संतान का कद इतना बड़ा हो जाएगा कि मैं उसे खत लिखूंगा और उसका प्रशंसक हो जाऊंगा.’ उन्होंने आगे लिखा, ‘मैं तो बच्चन जी की रचनाओं को ही उनकी संतान माने हुए था.’ यह पत्र अब उन्हीं के नाम से स्थापित ‘दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय’ में रखा हुआ है. चलिए आपको लिए चलती हूं दुष्‍यंत कुमार की एक और ग़ज़ल की ओर-

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा

मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहांं तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियांं

मुझे मालूम है पानी कहांं ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते

वो सब के सब परीशांं हैं वहांं पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है

कि इंसानों के जंगल में कोई हांंका हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में

वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा

यहांं तो सिर्फ़ गूंंगे और बहरे लोग बसते हैं

ख़ुदा जाने वहांं पर किस तरह जलसा हुआ होगा



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