Oponion: इन क्रूर मौतों और चीखों के लिए हम और आप ही तो जिम्मेदार हैं

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साल 2020 में हम उस शत्रु की ताकत से अंजान थे फिर भी हम असंभव सी दिखने वाली लड़ाई जीत गए. इतना ही नहीं, हमने उस अदृश्य शत्रु को खत्म करने के लिए वैक्सीन तक बना डाला, वो भी रिकॉर्ड समय में. लेकिन, उस अच्छे वक्त को हमने बहुत ही जल्दी गंवा दिया, अपनी असावधानी से. हमारे वैज्ञानिकों के अनथक मिहनत की बदौलत भारत ने दुनिया के 70-80 देशों में वैक्सीन भेजना शुरू कर दिया. लेकिन, इस खुशी पर हमारी असावधानी ने पानी फेर दिया.

हम जीतते-जीतते फिर हार की कगार पर पहुंच गए. हमारी बेफिक्री, बदइंतजामी और ढिलाई ने हमें फिर वहीं पहुंचा दिया, जहां हम पिछले साल खड़े थे, जिस मोड से आपको सिर्फ सुनसान सड़क दिखाई पड़ती है, खाली-खाली बाजार दिखाई पड़ते हैं, सन्नाटे में घिरी दुकानें नज़र आती हैं.अस्पताल से आ रही चीखें सुनाई पड़ती हैं. इसके लिए हम और आप ही ज़िम्मेदार हैं.

पिछले वर्ष वायरस के लिए हम चीन को जिम्मेदार ठहरा रहे थे लेकिन इस बार इस लहर को हमने हवा देकर अपने आप को खतरे में डाल दिया. इस हवा को हमने जहरीला बनाया. अब हम अपने आप को बंद के कगार पर पा रहे हैं.

जहां आप अपने परिवार के साथ खुद को माइक्रो-कंटैंटमेंट ज़ोन में कैद होते हुए देखते हैं. बड़े-बड़े अस्पतालों में सारे बेड भरने के बाद, आपको परिवार की कातर दृष्टि डराने लगती हैं. चीख़ों से आप मुंह फेर लेते हैं. जब नया वर्ष आया था हमने सावधानी भी बरतनी छोड़ दी. नए साल का उत्सव, होली, पार्टी, शादी-ब्याह हर जगह हमने असावधानी की इंतहा कर दी.

यकीन करें न करें इससे सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ उन लोगों को हुआ जो सड़कों पर काम करने वाले लोग थे, मजदूर थे, खेतों में काम करने वाले मजदूर थे, भवन निर्माण में काम करने वाले लोग थे, कारखानों के मजदूर थे, असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक थे. जो डर था फिर वही परिलक्षित हुआ. मुंबई, पुणे, सूरत, दिल्ली और पंजाब से लोगों का वापस फिर से पलायन शुरू हो गया. हम अगर पिछले साल की विपदा को याद रखते तो दोबारा इनके चूल्हों की आंच ठंडी नहीं पड़ती. बच्चे शायद दोबारा स्कूल जा पाते.

पिछली बार हमने सबक लिया था इस वजह से रेलवे मंत्रलाय ने स्थिति खराब होने से पहले ही हजारों लोगों को वापस गांव भेज दिया, लेकिन इसके खतरे भी थे, इन ट्रेनों में भरकर आ रही भीड़ में वैसे लोग भी शामिल थे, जिनकी जांच के लिए न तो हमारी सरकार पूरी तरह से तैयार दिखी और न ही रेलवे के पास ही इस तरह के संसाधन उपलब्ध थे. अब सब कुछ हमने भगवान भरोसे छोड़ दिया है.

मुंबई, पुणे, सूरत, अहमदाबाद, दिल्ली, लखनऊ, पटना, रायपुर, अमृतसर, जालंधर जैसे शहरों में देखते ही देखते अस्पताल भरने लगे. क्रिमेशन ग्राउंड और कब्रगाहों में जगह कम पड़ने लगी. पटना में तो गंगा के किनारे शवों को जलाने के लिए 10-10 घंटे का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है.

रांची से भी वैसी तस्वीर सामने आई जब शवों को खुले में जलाया गया. कब्रगाहों में जगह कम पड़ गईं. ऐसी ही तस्वीर देश के कई हिस्सों से आने लगी. कई बार शवदाह गृह की मशीनें भी बंद हो गईं, ये किस्से हमारी नाकामी के किस्से थे. जिसके लिए हमारी आने वाली पीढ़ी शायद हमें माफ न करें.

हम जब सीखकर भी सब कुछ भूल जाते हैं तब तक देर हो जाती है. बहुत देर. हम अपनी हर गलती के लिए व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं. मानते हैं कि नेताओं की और नीति निर्माताओं की जिम्मेदारियां ज़्यादा बड़ी होती हैं. लेकिन, हम और आप भी कम दोषी नहीं हैं, जो अपनी छोटी-छोटी गलतियों के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराने लगते हैं.

बड़ी-बड़ी चुनावी सभाएं, महाकुंभ में लाखों का हुजूम, ट्रेन पर असावधानी से सफर करते हजारों लोग, बाज़ारों में कोरोना गाइडलाइन को तोड़ते हुए बेपरवाह लोग, सिर्फ अपना नुकसान ही नहीं करते. ये लोग उनको भी खतरे में डालते हैं, जो हमेशा मास्क पहनते हैं और सावधानी बरतते हैं. कम से कम हम ऐसा न होने दें. बचा सकते हैं तो उन जिंदगियों को बचाएं जिनको हमारे मदद की दरकार हो. हम फिर से जीत सकते हैं. हम फिर लड़ेंगे, फिर जीतेंगे.

ब्लॉगर के बारे में

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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