Bihar Elections 2020: बिहार में बड़ा हो रहा ‘कमल’, नीतीश कुमार के हाथ से खिसक रहा मुस्लिम वोट

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नई दिल्ली/पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Elections 2020) के लिए नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अपने सभी 115 सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी है. नीतीश कुमार ने टिकट वितरण के जरिए अपने कोर वोटबैंक पिछड़ा और अतिपिछड़ा को साधकर रखने का दांव चला है. जेडीयू ने ढाई दर्जन सीटों पर मुस्लिम-यादव कैंडिडेट उतारकर आरजेडी के एम-वाई समीकरण में सेंध लगाने की कवायद की है. आरजेडी छोड़कर आए नेताओं को भी नीतीश कुमार ने निराश नहीं किया है. ऐसे में देखना है कि नीतीश कुमार अपने इन सिपहसलारों के जरिए बिहार की सियासी जंग फतह कर पाएंगे?

इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान बिहार के सीवान में एक मुस्लिम मतदाता ने समझाया था कि कैसे नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का बीजेपी के साथ गठबंधन करना मुस्लिम वोटर्स के लिए कोई मायने नहीं रखता. इस मतदाता ने कई कारण बताए थे, जिसमें एक नीतीश सरकार द्वारा प्राइमरी स्कूलों में सुधार और गरीब बच्चों की मदद करना था. मतदाता ने कहा था कि नीतीश सरकार की वजह से उनके बेटे को स्कूल की वर्दी मिली, जो संभवत: उसकी जिंदगी की सबसे खूबसूरत ड्रेस थी. जेडीयू ने ऐसे कई काम किए हैं, जिसके बाद उससे शिकायत नहीं रह गई. ऐसे में जेडीयू की टीम B यानी बीजेपी से भी उन्हें कोई समस्या नहीं.

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यही वह समय था जब मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार की लोकप्रियता चरम पर थी. बिहार में किए गए उनके कामों से राज्य में बदलाव की बयार आई. उस चुनाव में एनडीए ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में 32 पर जीत हासिल की. फिर इसके एक साल बाद यानी 2010 में विधानसभा के चुनाव हुए. नीतीश कुमार ने विधानसभा की कुल 243 सीटों में 206 पर जीत हासिल कर सत्ता में वापसी की.

ये वो नीतीश कुमार नहीं हैं और न वही एनडीए है. अब हालात बदल गए हैं. बीजेपी नीत एनडीए अब जेडीयू में बराबरी का आनंद ले रही है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार से मुस्लिम अलगाव बढ़ गया है. नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनावों में अपनी लोकप्रियता के साथ महागठबंधन के साथी आरजेडी और कांग्रेस के कारण मुसलमानों (आबादी का 17%) का समर्थन बनाए रखा था. उन्होंने 2017 में इसमें एक बदलाव किया और बीजेपी में वापस जाने के लिए इस समुदाय की पीठ में एक तरह से छुरा घोंपा गया.

तब से नीतीश कुमार (जो कभी एनडीए में रहते हुए भी मोदी के रास्ते पर अकेले खड़े होने का सार्वजनिक प्रदर्शन करते थे) बिहार में महागठबंधन के लिए एक लीड रोल निभा रहे हैं. इसी का नतीजा है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की. कांग्रेस सिर्फ किशनगंज सीट बचा पाई, क्योंकि इसमें 70% मुस्लिम आबादी थी. AIMIM उस सीट पर तीसरे स्थान पर रही.

कभी जेडीयू के पास अली अनवर, डॉ. एजाज अली और डॉ. शकिल अहमद जैसे नेता थे. अब जेडीयू में एमएलसी और राज्यसभा के पूर्व सांसद गुलाम रसूल बलियावी के अलावा कोई बड़ा मुस्लिम नाम नहीं है.

इस बार के चुनाव की बात करें, तो कुल 115 निर्वाचन क्षेत्रों में 10 मुस्लिम-बहुल क्षेत्र हैं, जहां जेडीयू एनडीए के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ रही है. ये 10 सीटें हैं:- सिकता (उम्मीदवार फिरोज अहमद खुर्शीद), शेहर (सरफुद्दीन), अररिया (शगुफ्ता अज़ीम), ठाकुरगंज (नौशाद आलम), कोचाधामन (मोहम्मद मुजाहिद), अमौर (सबा ज़फ़र), दरभंगा ग्रामीण (फराज फातमी), कांति (मोहम्मद जमाल), मारहौरा (अल्ताफ राजू) और महुआ (प्लाज्मा परबीन). इन सीटों पर वोट हासिल करने के लिए नीतीश सरकार पिछले 15 वर्षों में मुस्लिम समुदाय के लिए किए गए कामों को गिना रहे हैं.

जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी कहते हैं, ‘हुनर और औज़ार जैसे कौशल विकास कार्यक्रमों के लिए तालीमी मरकज (स्कूल ड्रॉप आउट के लिए ब्रिज कोर्स) बनाने के लिए नीतीश कुमार ने समुदाय के लिए बहुत कुछ किया है. हज भवन और कुछ अन्य जिलों में कोचिंग सेंटर बनाना भी एक अच्छा शिक्षा मॉडल है. अब ये मुस्लिम समुदाय पर निर्भर करता है कि वे केवल नारे लगाना चाहते हैं या कुछ ठोस काम देखना चाहते हैं.’

वहीं, जेडीयू के पूर्व नेता अनवर (जो अब अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम मेहाज नाम के राजनीतिक मंच के प्रमुख हैं) ने कहा कि उन्होंने बीजेपी के बढ़ते प्रभाव के कारण पार्टी छोड़ दी थी. अब नीतीश कुमार पर कोई भरोसा नहीं रहा. एनडीए में उनकी वापसी से मुसलमानों को ठेस पहुंची है. बीजेपी की आक्रामक राजनीति ने मुसलमानों को जेडीयू से अलग कर दिया है. वे वोटों को प्रभावित कर सकते हैं.’

बात आरजेडी और कांग्रेस की भी कर लेते हैं. बिहार चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस अभी भी मुस्लिम वोट के प्रमुख दावेदार बने हुए हैं. जबकि, AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी को नीतीश कुमार से आगे बढ़कर किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार के सीमांचल क्षेत्रों में अच्छा वोट शेयर मिलने की उम्मीद है. AIMIM बिहार के युवा अध्यक्ष आदिल हसन आज़ाद ने कहा, ‘हम सीमांचल के विकास के बारे में बात कर रहे हैं. हमने पिछले लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया और विधानसभा उपचुनावों में अपना खाता खोला. हम सकारात्मक वोट मांग रहे हैं.’

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आरजेडी के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, ‘हम महागठबंधन से अल्पसंख्यक वोटों के प्रति आश्वस्त थे. लालू प्रसाद की धर्मनिरपेक्षता के कारण वे हमारा समर्थन करते हैं. हम नीतीश कुमार की तरह एक शिविर से दूसरे शिविर तक नहीं जाते. कांग्रेस और लेफ्ट के साथ हमारा मजबूत गठबंधन है. LJP अपना दोहरा खेल खेल रही है.’ ऐसे में देखना है कि नीतीश का ये समाजिक समीकरण चुनावी जंग में क्या गुल खिलाता है.





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