Bihar Election 2020: लालू की छाया से बाहर आने की कोशिश में तेजस्वी यादव, लेकिन मुश्किल है राह

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लालू और तेजस्वी की फाइल फोटो (तस्वीर- News18)

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 (Bihar Assembly Election) को लेकर बिहार इन दिनों खासा चर्चा में बना हुआ है. राजनीति एक बार फिर त्रिकोणीय रानजीतिक शक्ति और जाति के ध्रुवीकरण के साए में आ गई है.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    October 14, 2020, 2:55 PM IST

नई दिल्ली/पटना. विधानसभा चुनाव 2020 (Bihar Assembly Election) को लेकर बिहार इन दिनों खासा चर्चा में बना हुआ है. बिहार की राजनीति एक बार फिर त्रिकोणीय रानजीतिक शक्ति और जाति के ध्रुवीकरण के साए में आ गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की जनता दल यूनियन (जदयू), चिराग पासवान (Chirag Paswan) की लोकजन शक्ति पार्टी (लोजपा) और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बिहार के तीन मुख्य राजनीतिक दल हैं. चुनाव में अहम मुकबला इन तीनों दलों के बीच का है.

कांग्रेस (यूपीए) और बीजेपी (एनडीए) गठबंधन के जरिए राज्य में अपने राजनीतिक हित साधते आए हैं. नीतीश सत्ता में हैं, चिराग पासवान लोजपा की अगुवाई कर रहे हैं और लालू के बेटे तेजस्वी यादव (Tejasvi Yadav) पिता के जेल में होने के चलते चुनावी कमान संभाल रहे हैं. लेकिन तेजस्वी पार्टी का वर्चस्व कायम करने के लिए पिता की छवि को नकाकर कर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के नक्शे कदम पर आगे बढ़ रहे हैं.

अखिलेश यादव के नक्शे कदम पर तेजस्वी
बिहार की राजनीति में लालू के दबदबे के दिन खत्म होते दिख रहे हैं क्योंकि पार्टी के नए उत्तराधिकारी और लालू के छोटे बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव अपने पिता की राजनीतिक परछाई से बाहर आने का प्रयास कर रहे हैं। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में पिता मुलायम सिंह यादव को हाशिए पर रख चुनाव लड़ा था, लेकिन इसका परिणाम पूरे देश ने अपनी आंखों से देखा था. अब तेजस्वी भी बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए पिता लालू को किनारे करते दिख रहे हैं.पोस्टरों से हटाई पिता की पहचान

तेजस्वी ने विधानसभा चुनाव 2020 में नई रणनीति के तहत अपने चुनावी प्रचार अभियान को नया रूप दिया है. इस बार चुनावों में पार्टी के पोस्टरों में लालू-राबड़ी की तस्वीर नदारद है. क्योंकि राजद के बीते कुछ प्रोजेक्ट्स के पोस्टरों में लालू का होना पार्टी को भारी पड़ गया था. क्योंकि चारा घोटाले में सजा काट रहे लालू के साथ जदयू ने तेजस्वी को भी घोटाले में शामिल बताकार राजनीतिक कार्ड खेल लिया था. वहीं, आमचुनाव 2019 में भी लालू वाले पोस्टर के कारण पार्टी को एक सीट तक हासिल नहीं हुई थी. यही कारण है कि तेजस्वी अब आगे की राजनीति में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं.

युवा वोटरों पर ज्यादा ध्यान
तेजस्वी ने विधानसभा चुनाव 2020 की कमान खुद संभालने का फैसला लिया है. इसके पीछे पार्टी का सबसे बड़ा उद्देश्य युवा मतदाताओं (18-30 उम्र) को लुभाना है. बता दें कि राज्य में युवा मतदाता 24 फीसदी है जो 1990 के बाद जन्मे हैं. ये 24 फीसदी युवा मतदाता बिहार में लालू के जंगल राज से भी अवगत नहीं हैं. वहीं, दो महीने पहले ही तेजस्वी ने भी बिहार में 1990 से 2005 तक पार्टी के ‘जंगल राज’ की छवि पर पर्दा डालने के लिए माफी भी मांग ली थी.

इन मुद्दों पर नीतीश को घेरने की तैयारी

तेजस्वी ने नीतीश कुमार को दबाने के लिए बेरोजगारी और प्रवासी मजदूरों जैसे अहम मुद्दों को पार्टी एजेंडा में शामिल किया है. इसका अर्थ यह है कि तेजेस्वी बिहार में खुद को एक विकासोन्मुख नेता के रूप में खड़ा करना चाहते हैं. यही कारण है कि उन्होंने इस बार ‘बिहार के लिए नई आशा’ प्रोजेक्ट में ‘नई सोच नया बिहार’ और ‘अबकी बार युवा सरकार’ जैसे नारों को बुलंद किया है.

जातिगत समीकरणों का रखा पूरा ध्यान
पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर भी नई रणनीति पर काम किया गया है. इसके लिए उच्च जाति के नेताओं को राजद के कोर वोट बैंक के लिए 13 प्रतिशत यादव और 17 प्रतिशत मुस्लिमों (M-Y Factor) को ध्यान में रखते हुए वरीयता दी गई है. साथ ही बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से जो लोग नाखुश हैं, पार्टी ने उनपर भी ध्यानाकर्षित करने काम किया है. पार्टी ने पिछड़ी जाति, दलित और अति पिछड़ी जातियों पर बल देते हुए जातिगत समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा है.

तेजस्वी के भविष्य का फैसला करेंगे चुनाव
बता दें कि आगामी चुनावों को तेजस्वी यादव के लिए एक अवसर के रूप में देखा जा रहा हो. क्योंकि, यदि वह चुनाव में पर्याप्त संख्या में सीटें जीतने में कामयाब होते हैं तो वह अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सकते है और यदि वह बेहतर प्रदर्शन करने में विफल रहे तो उनके राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे.





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