Bihar Election 2020: बिहार में लगातार बढ़ा बीजेपी का बोलबाला, कांग्रेस को भी मिला थोड़ा लाभ

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नई दिल्ली/पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2020) के लिए पहले चरण के मतदान के लिए 12 दिन का वक्त बचा है. 28 अक्टूबर को राज्य में पहले चरण के लिए मतदान संपन्न कराए जाएंगे. इससे पहले बीते चार विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थानीय पार्टियों को राष्ट्रीय दलों से मजबूत चुनौती मिलती दिख रही है. बीते चार विधानसभा चुनावों में राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों का मत प्रतिशत बढ़ा है. इसमें भी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मत प्रतिशत में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

बिहार में भाजपा ही इकलौती राष्ट्रीय पार्टी है, जिसका मत प्रतिशत डबल डिजिट यानी दो अंकों में पहुंच चुका है. सन 2000 के नंवबर में बिहार के झारखंड (Jharkhand) से अलग होने के बाद फिलहाल राज्य में चार विधानसभा चुनाव क्रमशः 2005, 2010, 2015 में हो चुके हैं. इस दौरान बिहार में चुनाव लड़ने वाली 6 राष्ट्रीय पार्टियों का मत प्रतिशत 23.57 से बढ़कर 35.6 हो गया है. जो 6 राष्ट्रीय पार्टियां बिहार में चुनाव लड़ती हैं, उसमें भाजपा, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम और बसपा शामिल हैं.

इन सभी राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा मत प्रतिशत में वृद्धि भाजपा के पक्ष में हुई. बावजूद इसके कि साल 2015 के चुनाव में शुरुआती 2 साल छोड़ दें तो वह लगातार बिहार की सत्ता में बनी रही. बिहार का विभाजन होने के बाद भी भाजपा के वोट शेयर में कमी दर्ज नहीं हुई. फरवरी 2005 में बीजेपी को 10.97 वोट मिले थे जो साल 2015 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 24.42 हो गया. हालांकि इसके पीछे एक मजबूत कारण यह भी है कि पार्टी ने साल 2015 के विधानसभा चुनाव में 157 सीटों पर इलेक्शन लड़ा था. इस इलेक्शन से पहले भाजपा 102-103 सीटों पर प्रत्याशी खड़ी करती थी. ऐसा नहीं है कि अन्य पार्टियां कम सीटों पर चुनाव लड़ती थीं, लेकिन अधिकतर के मत प्रतिशत में कमी दर्ज की गई.

बसपा ने लड़ा था 228 सीटों पर चुनावबात साल 2015 के विधानसभा चुनाव की करें तो बसपा ने सबसे अधिक 228 सीटों पर इलेक्शन लड़ा था. इसके बाद भाजपा 157, सीपीआई 98, कांग्रेस 41 और एनसीपी ने 41 सीटों पर इलेक्शन लड़ा था. इसमें कांग्रेस को मिले मत प्रतिशत में बढ़ोतरी छोड़कर बाकी सभी में गिरावट देखी गई

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसाल साल 2005 और साल 2015 के बीच, भाजपा ने जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उनकी संख्या 102 से बढ़कर 157 हो गई और उसका वोट प्रतिशत 10.97% से 24.42% हो गया. इसी समयावधि में कांग्रेस ने साल 2010 में 243 सीटें, और साल 2015 में 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसका वोट शेयर केवल 5% (फरवरी 2005) और 8.37% (साल 2010) के बीच था.

साल 2015 के इलेक्शन में 200 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने वाली एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी बीएसपी का मत प्रतिशत 4.41% था जो 2.07% तक पहुंच गया.

CPI-CPM के लिए बुरी खबर!
साल 2005 के चुनाव में सीपीआई उम्मीदवार की संख्या 17 और साल 2015 के इलेक्शन में 98 के बीच थी, लेकिन वोट शेयर केवल 1.36% और 2.09% ही था. वहीं CPM ने साल 2005 में 10 सीटों पर इलेक्शन लड़ा और साल 2015 में 43 सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे फिर भी केवल 0.61% (साल 2005) और 0.71% (2015) वोट मिले. साल 2005 में आठ सीटों पर लड़ने वाली NCP ने साल 2010 में 171 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन वह भी 1.82%से ऊपर नहीं उठ सकी.

इसकी तुलना में, अक्टूबर 2005 में तीन मुख्य क्षेत्रीय दलों का वोट शेयर LJP का 11.10% (203 सीटें), RJD का 23.45% (175 सीटें) और JD (U) का 20.46% (139 सीटें) था. वहीं साल 2015 में, वे क्रमशः 4.83% (42), 18.35% (101) और 16.83% (101) पर थे.

क्षेत्रीय दलों के संयुक्त वोट शेयर में भी साल 2005 (अक्टूबर) में 57.39% से 42.58 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है. इसी तरह, दो अन्य श्रेणियां – स्टेट पार्टियां (अन्य राज्य) और निर्दलीय उम्मीदवारों के वोट शेयर में भी पिछले चार विधानसभा चुनावों में गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, ‘पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों’ की श्रेणी में मामूली वृद्धि हुई.





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