Bhojpuri रिपोर्ताज: जो रे कोरोनवा, दुलम कइले धमकऊआ पूड़ी के सवाद…

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दुइ बरिस हो गइल बड़की पुड़ी के ठीक से दरसन कइला. सिवबालक बाबा के ईनार पर पंचयती फेरू सुरू हो गइल बा. गरमी हर साल नियर एहू साल परतिया. उमस आ पसेना से बेचैनी भइल रहता. हर साल नियर एह बेचैनी आ गरमी के मुकाबला खातिर टोलाभरि के लोग रोज अन्हार होते ईनार के जगति पर ओही तरी जुटता, जइसे पहिले जुटत रहल हा. कोरोनवा के चलते बाकिर भीड़ि कम रहता. चरन बाबा के किरिपा बा कि एह गांव से कोरोना के चलिते एक ही माटी उठल. बाकिर कई गो गांवन के अइसन सौभाग ना रहल. अगल-बगल के कुछु गांवन में आजुओ स्यापा बा, कुछु अइसन दुर्भाग्यशाली घर बाड़े स, जवना से हफ्तेभर में दू-दू, तीनि-तीनि को मयेजलि गंगाजी गइल बा.

कोरोना के जइसहीं दोसरकी लहरि सुरू भइल आ हंफनी के बेमारी बढ़ल सुरू भइल, ओइसहीं मदन चाचा पंकजवा के बियाह के दिन टारि दिहले. उनुका देहि से अब ई आखिरिए बियाह ह. सालन से उनुका साध बा एह बियाह के धूम-धाम से करे के..एही से तिलक-बियाह दूनों के दिन टालि देले बाड़े.

कोरोना में बियाह करिते त उनुका सामने ई सवाल उठि खाड़ा होइत कि केकरा के छोड़िं आ केकरा के बोलाईं..आपन पट्टीदरिए अइसन बा कि ओके पूरा सवांग जुटि जासु त बाराति खातिर गांव के जरूरते ना पड़ी. पढ़ल-लिखल आ प्रोग्रेसिव लोग एह चलन के चाहे जाताना आलोचना करत होखसु लोग, बाकिर गांव एह के आपन प्रदर्शन ना आभार मानेला..आपाना घर-परिवार, पट्टीदार-नातेदार संगे तेवहार नियर उत्साह से कुछु समय बितावे के मोका मानेला.

अइसन नइखे कि तिलक-बियाह आ सादी कोरोना में नइखे होत. बाकिर प्रोटोकाल के वजहि से लोगन के जुटान कम हो गइल बा. केहू के मुअला भा बियाह के परोजन के दरोगा जी के जइसहीं जानकारी मिलि जाता, ऊ ओह आदमी के दुआर पर धमकि आव तारे.. ई चेतावनी के संगे कि पचास-साठि आदमी से ज्यादा बोलवलिं त हमरा चालान करे के मजबूर होखे के परी. बलिया, गाजीपुर, आरा, बक्सर आपाना हथिया कान वाली पुड़ी खातिर मसहूर ह. इहवां के पुड़ी पतल में गिरेले ना, धमकि जाले. एकर बनावे के तरीका अइसन बा कि बड़की गिहिथिन लोगन के हाथ के सवाद लोग हथियाकान पुड़ी के आगे फीका परि जाला. साल-दर-साल लगन के दिन में लोगन के एकर सवाद लेबे का आदति बा, बाकिर दू साल से जइसे ई सवादे दुलम हो गइल बा.गांव में गाट बाबू एघरी रोजे हहर तारे. बड़की पुड़ी, आलू पटल के तरकारी आ कटहर दम गाट बाबू के जइसे रसेंद्रिय के तेज कइ देत रहलि हा. ओह पर सजाव दही आ रासि चीनी मिली गइल त समझीं गंगाजी सवाद के बेड़ा पार लगा दिहली. गाट बाबू के मिठाई ना चाहीं, बुनिया चाहे सूखगर होखे बा रसगर, गाट बाबू ओह से दूरे रहेले. जवानी के दिन से पुड़ी खातिर ऊ दूरि-दूरि ले दउरि जात रहले हा. अब उमिर के आठवां दसक चलता. दूरि जाए के जांगर नइखे रहि गइल, बाकिर आसु-पासु के इलाका के अइगा उनुका के जइसे उत्साह से भरि देत रहल हा. बाकिर ई कोरोनवा अइसन कइले बिया कि गाट बाबू जइसन काताना लोग हहरि के रहि गइल बा.

कोरोना के वजहि से ई पुड़ी छाने वाला, बूनिया बनावे वाला हलुआई आ मास्टर लोगन के भी काम ठप परि गइल बा. लगन के दिन में ऊहन लोग के मांग बढ़ि जात रहल हा. भंडार के एस्टीमेट खातिर जब बोलावल जाई त ऊ लोग पूरा बन बनाके दुआर पर आवत रहल हा लोग. दुआर पर आवते मास्टर खातिर चाह आई, खइनी के इंतजाम होई आ मास्टर कागज-कलम से लगिहें नोट करावे.बारात-तिलकहरू आ गांव-जवार के खवनिहारन के हिसाब से लिखाए लागी, रिफाइंड तेल बीस टीन, आम छाप आटा चार कुंटल, महीनका चाउर पचास किलो, आलू दू कुंटल, पटल पचास किलो, कटहर बड़े-बड़े आठ गो, तीन टिना सरिसों के तेल, दू कुंटल चीनी, केवड़ा, गुलाब जल, गरम मसाला आदि-आदि.

मिस्तिरी जब सामान के लिस्ट लिखवावे लगिहें तो उनुकर ताव देखत बनत रहल हा. बाकिर कोरोना दू साल से ताव जइसे ठांढा गइल बा.

बड़की पुड़ी के भोज के तेयारियो गजब होला. नेवता पर जाए वाला सांझि खा नहा-धो के किरिच कइल कुर्ता-पैजामा, चाहे धोती –पैंट झारि के माथ में गमकऊआ तेल लगा के बबड़ी झारि के चलि दी लोग. कपड़ा में सेंट लागि गइल त समझिं सोने पर सुहागा.

तिलकहरू आ बाराति में जाए के बा त ओह हिसाब से तनी ढेरे तेयारी होई. चुहल चलत रही. राति का पुड़ी आ पोलाव खाई को गांवे लौटाई होई त जइसे पूरा राहि खिस्सा-कहानिए से भरि जात रहल हा.

अगर भोज बढ़िया भइल भा खराब त ओकर चर्चा हफ्तन चलत रहल हा. ऊ तब तक ले ना खतम होत रहल हा, जबले दोसरका भोज में नया खिस्सा-कहानी ना हो जाइ.

कोरोना के कहरि के बीचे गांव के ईनार पर राति खा जुटान त होता, केहू मास्क लगवले रहता त केहू ना. दुनिया-जहान के चर्चा के बीच रोज कम से कम एक बेरि बड़की पुड़ी के कमी के चर्चा जरूर होला. पुड़ी के सवखीन लोगन के मजाक उड़ेला, उनुकर जीव हहरला पर मजा लियाला. संगही उमेदियो जतावल जाला कि कोरोनवा भागि जरूर, तब एक बेरि फेरू पतल में बड़की पुड़ी के धमक जरूर सुनाई, पतल से रसदार बूनिया के बहल रोके के तेयारी होई आ बिना पियाजु-लहसुन के बने वाली आलू-पटल के तरकारी आ कटहर दम के सवाद जरूर मिली. तब फेरू पुड़ी के सवखीन दुपहरिये से मरीच खा के सरबत पी के पेट सोन्हावत रहिहें..जवना से संझिया के भोज में पुड़ी से जीभि के ठीक से मिलन हो पाई . (उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



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