Bhojpuri: फेल बा हवाई जहाज के सवारी, सभसे अगाड़ी हमार बैलगाड़ी…

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एने एगो खबर अखबारन के सुर्खी बनल कि दुनिया के सभसे अमीर अदिमी अंतरिक्ष विमान में बइठि के अंतरिक्ष के सैर करे गइलन. अंतरिक्ष में जाए के लरिकाइएं से उन्हुकर साध रहे. आजु किसिम-किसिम के मारक क्षमता वाली जेट आ लड़ाकू विमान चरचा में रहल बा. हवाई जहाज आ हेलीकाप्टर के त अब कवनो गिनतिए नइखे. अब त आन्हीं-तूफान के मात देबेवाली बुलेट ट्रेन के जबाना बा. हवा में उड़ेवाली कार के इंतजार होत बा-सड़क के जाम से छुटकारा पावे खातिर. नया-नया मन मोहत माॅडल के कार,बाइक,स्कूटी, स्कूटर आ साइकिल के भला का बिसात बा! इन्हनीं का सोझा त बैलगाड़ी के नांवों लिहल बुरबकाही कहाई.

बाकिर अकबकाईं मत! मौजूदा वैज्ञानिक आविष्कार के बदउलत भलहीं एकइसवीं सदी में एह सभ वाहनन के बाजार गरमाइल बा,बाकिर बीसवीं सदी आ ओकरा पहिले गाड़ी के मतलबे बूझल जात रहे बैलगाड़ी. फेरु कोइला-पानी से चलेवाली भाप के छुकछुकिआ रेलगाड़ी.तबहूं गांवागाईं सभकर लाइफ लाइन रहे बैलगाड़ी.

बांस आ लकड़ी के बनल गाड़ी के दूनों ओरि लकड़ी के चक्राकार बड़हन-बड़हन पहिया लागल रहत रहे, जवनन के परिधि पर लोहा के पत्तर के हाॅल आगी में तपाके, फेरु पानी से ठंढा कऽके पहिया प बइठावल गइल रहत रहे. आगा दूगो निठाह सेहतमंद बैलन के गाड़ी खींचे खातिर जोतल जात रहे. ओह बेजबान के बरिआर कान्ह प गाड़ी आ ओह पर लदाइल बोझा के ढोवे आउर गंतव्य तक पहुंचावे के जिम्मेवारी होत रहे. चाहे गाड़ी से केहू के बियाह में बरिआती जाए के होखे भा कवनो सामान ढोके कतहीं ले जाए के होखे-गाड़ी सेवा में हाजिर रहत रहे. गाड़ी पर आगा दूनों ओरि गोड़ लटकवले आ दूनों बैलन के पगहा थम्हले गाड़ीवान बइठल रहसु,जे बैलन के टिटिकारत सही राह पर लेके चलसु.

जब शहर भा कस्बा से किराना के सामान ले आवे के होखे, त बैलगाड़ी प रात में लदा जात रहे, बैलगाड़ी के नीचे एगो ललटेन जराके टांगि दिहल जात रहे, गाडी का संगें एगो पोसुआ कुकुर चलत रहे आ गाड़ीवान गाड़ी हांकत अकसरहां सूति जात रहे, बाकिर बैल जानल-चिन्हल राह पर अपने आप आगा बढ़ल जा स आ साथ में चलत कुकुर रखवार के भूमिका निबाहत रहे. समय-समय पर बैलगाड़ी-दौड़ प्रतियोगिता के आयोजनो होत रहे, जवना में एक से एक गाड़ीवान अपना गाड़ी-बैलन के सजा-धजाके मैदान में पहुंचत रहलन आ सभसे तेज गाड़ी धउरावे वाला गाड़ीवान के इनामो दिहल जात रहे. तब प्रतियोगिता में जीते खातिर देखनिहारन के तरफ से तरह-तरह के बोल फूटत रहे. एगो मेहरारू अपना मरद से कहत बाड़ी-तनी ललकार के गड़िया हांकऽ,

मोरे बलमा गड़ीवान!

पगरी बन्हले विजयी गाड़ीवान आपन मोंछि अइंठत हुलास से भरिके गावत रहे-

सभसे अगाड़ी

हमार बैलगाड़ी!

कनिया के जब नइहर से विदाई होखे, त गाड़ी में साड़ी आ चद्दर के ओहार लगा दिहल जात रहे आ कनिया ओही गाड़ी में बइठि के ससुरा आवत रहली. बीच-बीच में अनजान राह के देखत ऊ चिहातो रहली आ ठहरिके कुदरती छटा बिखेरत दृश्य देखिके अभिभूतो होत रहली. फिलिम ‘नदिया के पार’ में बैलगाड़ी प के एगो अइसने नजारा देखत नायिका गावत बाड़ी-

कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया,

ठहर-ठहर, ये सुहानी-सी डगर

जरा देखन दे,

मन भरमाए,नैना बांधे ई डगरिया

जो जाएंगे ठहर, दिन जाएगा गुजर

गाड़ी हांकन दे!

‘तीसरी कसम ‘ फिलिमो में गाड़ी में परदा के आड़ में बइठल हीराबाई आ गाड़ी हांकत हिरामन वाला दृश्य साइते केहू भुला पवले होई.

बैलगाड़ी के चक्राकार पहिया गाड़ी चलत खा जइसे-जइसे घूमत रहे,ऊ पहिए नियर घूमत समय के एहसास करावत रहे. एही से महाभारत धारावाहिक में ओही गोलाकार घूमत पहिया के दरसावत कालचक्र के गतिशीलता के एहसास करावल गइल रहे, जवना के मार्फत ‘चरैवेति-चरैवेति ‘ के सनेस दिहल जात रहल बा.

बैलगाड़ी युग के आपन खासियत रहे. ना त ओह दौर में दौड़-धूप ,भागम-भाग के आपाधापी रहे, ना दोसरा के ढकेलिके आगा बढ़े के चाहत आ भेड़ियाधसाने रहे.

तब मनई-मनई में मिल्लत रहे आ पशु-पक्षी, प्रकृति का संगें सहजीवन के भाव रहे. कुदरत के हिफाजत, माल-मवेशी-चिरई-चुरुंग के प्रति दोस्ताना रवैया हरेक नर-नारी के सुभाव रहे आ ओह सभ के आपन संताने बूझल जात रहे. बैल के अड़भंगी शिव बाबा के सवारी मानल जात रहे आ बैलगाड़ी में जोताएवाला बैल सवांगें नियर

खेत के जोताई-बोआई, हर-हेंगा में साथ देके गिरहत्त के जिनिगी में खुशहाली ले आवत रहे आ गोधन का दिने पूजलो जात रहे. जब कवनो नदी के ओह पार गाड़ी के ले जाए के होखे, त नाव में गाड़ी रखा जात रहे, बैल पवंरिके नदी पार कऽ लऽ स. जब कबो नाव में छेद हो जाउ भा नदी सूखि जाउ,त नाव के बैलगाड़ी प लादिके उचित जगहा पहुंचावल जात रहे. तबे से ई कहाउत मशहूर हो गइल-

कबो नाव गाड़ी प,

कबो गाड़ी नाव प!

कहे के मतलब ई कि ‘पुरुष बली नहीं होत है,समय होत बलवान’.

दरअसल बैलगाड़ी संस्कृति अपना देश के सभके जिआवेवाली आ सामूहिकता में सहज जिनिगी जीए के सनेस देबेवाली लोकसंस्कृति ह. एमें विकास-बढ़न्ती खातिर उतजोग त होला, बाकिर मनुजता के भाव सर्वोपरि रहेला.

जइसे-जइसे मशीन आधारित विकास आ मतलबी सोच हावी होत गइल, बैलगाड़ी संस्कृति के उपेक्षा होखे लागल रहे आ आस्ते-आस्ते अदिमियो मशीन बनिके रहि गइल रहे. चाहे पुरुबिआ बैलगाड़ी होखे भा पच्छिमी उत्तरप्रदेश आउर दीगर इलाका के भैंसागाड़ी-पहिले लकड़ी के पहिया का जगहा टायर के चक्का लगावल गइल, फेरु डीजल प चलेवाला मोटर बइठा दिहल गइल. ओही घरी एगो भोजपुरी फिलिम के गाना शोहरत पवलसि-

पहिले पहिल हम गइनीं गवनवा,

देखेनीं डीजल गाड़ी ए दिलवरजानी!

आगा चलिके मोटरगाड़ियन के भरमार होखे लागल रहे, किसिम-किसिम के रेलगाड़ियन का संगहीं आवागमन के नया-नया आरामदेह संसाधन के इजाद हो गइल रहे. ‘चलती का नाम गाड़ी ‘ के ई सनेस भला के भुला सकेला-

बाबू! समझो इशारे

हारन पुकारे पम-पम-पम,

यहां चलती को गाड़ी

कहते हैं प्यारे पम-पम-पम!

नतीजा ई भइल कि एकइसवीं सदी के जेट-बुलेट ट्रेन के एह भौतिकवादी युग में गांव वीरान होत चलि गइलन स. दुआर पर ना प्रेमचंद के कथानायक दू बैलन के जोड़ी वाला हीरा-मोती बैल रहि गइलन स आ ना कबो सभसे अगाड़ी रहेवाली बैलगाड़िए रहि गइलि. सवारथ में आन्हर मशीन बनल मनई परमारथ आ पशु-पक्षी-प्रकृति से सदियन से चलि आवत नेह-नाता भुला गइल. तबे नू कोरोना महामारी के शिकार होके सभ किछु अछइत प्रानवायु खातिर तरसत बा. फेरु का बैल आ का बैलगाड़ी!

बाकिर आजुओ जब सहज सुभाव, सामूहिक सामाजिक संरचना आ लोकसंस्कृति के खूबसूरती सुरता प चढ़ेला,

त पेट्रोल-डीजल के आसमान छूवत दाम से आजिज मन बैलगाड़ी संस्कृति का ओरि लवटल चाहेला आ ओठ से अचके ई बोल फूटि परेला-

सभसे अगाड़ी

हमार बैलगाड़ी! (भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



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