वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो, पढ़ें ‘मोमिन’ की शायरी

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Momin Khan Momin Shayari: मोमिन ख़ां ‘मोमिन’ (Momin Khan Momin) उर्दू के उन शायरों में शुमार हैं, जिनकी बदौलत उर्दू ग़ज़ल (Ghazal) को चार चांद लगे. उन्‍होंने क़सीदे (Qasida) और मसनवी (Masnawi) भी लिखीं, लेकिन उनकी ज्‍़यादा शोहरत ग़ज़ल की वजह से ही हुई. ‘मोमिन’ का असल नाम हकीम मोमिन खां था. शायरी में भी ‘मोमिन’ तख़ल्‍लुस रखते थे. आसान अल्फ़ाज़ में होने के बावजूद उनका तर्जे़ बयान अलग है, ग़ज़ल कहने का अंदाज़ अलग. इश्‍क़ के रंग से लबरेज़ उनकी शायरी (Shayari) ख्‍़याली कम हक़ीक़ी (Real) ज्‍़यादा नज़र आती है. शायद यही वजह है कि कभी मिर्ज़ा ग़ालिब ने उनके एक शेर ‘तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नही होता’ पर अपना दीवान दिए जाने की बात कही थी. आज हम ‘कविताकोश’ के साभार से हाजि़र हुए हैं मोमिन ख़ां ‘मोमिन’ का रूमानी कलाम लेकर, तो पढ़िए और इसका लुत्‍फ़ उठाइए…

1.वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो के न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो के न याद हो

वो नये गिले वो शिकायतें वो मज़े-मज़े की हिकायतेंवो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो के न याद हो

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो के न याद हो

सुनो ज़िक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का
वो निबाहने का तो ज़िक्र क्या, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आश्ना, तुम्हें याद हो के न याद हो

हुए इत्तेफ़ाक़ से गर बहम, वो वफ़ा जताने को दम-ब-दम
गिला-ए-मलामत-ए-अर्क़बा, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर, वो करम के था मेरे हाल पर
मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा, तुम्हें याद हो के न याद हो

कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तगू
वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो के न याद हो

किया बात मैं ने वो कोठे की, मेरे दिल से साफ़ उतर गई
तो कहा के जाने मेरी बाला, तुम्हें याद हो के न याद हो

वो बिगड़ना वस्ल की रात का, वो न मानना किसी बात का
वो नहीं-नहीं की हर आन अदा, तुम्हें याद हो के न याद हो

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ “मोमिन”-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो.

2. ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें कि हो गये नाचार जी से हम

हँसते जो देखते हैं किसी को किसी से हम
मुँह देख-देख रोते हैं किस बेकसी से हम

उस कू में जा मरेंगे मदद ऐ हुजूमे-शौक़
आज और ज़ोर करते हैं बेताक़ती से हम

साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया
लो बन्दगी कि छूट गए बन्दगी से हम

बे-रोये मिस्ले-अब्र न निकला ग़ुबारे-दिल
कहते थे उनको बर्क़े-तबस्सुम हँसी से हम

मुँह देखने से पहले भी किस दिन वह साफ़ थे
बे-वजह क्यों ग़ुबार रखें आरसी से हम

है छेड़ इख़्तलात भी ग़ैरों के सामने
हँसने के बदले रोयें न क्यों गुदगुदी से हम

क्या दिल को ले गया कोई बेग़ाना-अश्ना
क्यों अपने जी को लगते हैं कुछ अजनबी से हम

इन नातवानियों पे भी थे ख़ारे-राहे-ग़ैर
क्योंकर निकाले जाते न उसकी गली से हम.





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