राजस्थान में ऊंटनी के दूध से लुप्त होते ऊंटों को मिलेगा नया जीवन! किसानों ने किया ये खास उपाय

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राजस्थान में पिछले 4 दशक में ऊंटों की संख्या 10 लाख से घटकर 2 लाख पहुंच गई है.

राजस्थान में ऊंटों (Camel) की संख्या में तेजी से कमी होती जा रही है. इस दिशा में सरकार की कोशिश भी नाकाम साबित हो रही है. ऐसे में यहां के किसान (Farmers) खेती में ऊंटों का उपयोग कर संरक्षण के उपाय कर रहे हैं. ऊंटनी के दूध की मार्केटिंग की जा रही है.

जयपुर. राजस्थान में ऊंट (Camel) केवल एक पशु नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति का एक हिस्सा है. ढोला-मारु, पाबूजी, बाबा रामदेव, खिमवाजी और महेन्द्र-मूमल जैसे कई लोकगीत ऊंटों को आधार मानकर ही रचे ही गये हैं. लेकिन अब इन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. मशीनी युग में अनुपयोगी साबित होने के चलते रेगिस्तान का जहाज कहे जाने वाले ऊंट का कुनबा लगातार कम होता जा रहा है. कुछ दशकों पहले तक सूबे में ऊंटगाड़ी सवारी और परिवहन का अहम माध्यम हुआ करता था. लेकिन अब वाहनों की रेलमपेल और गांवों में कच्चे रास्ते खत्म होने से ऊंट की उपयोगिता लगातार घटती जा रही है. यही वजह है कि अब ऊंट पालन पशुपालकों के लिये मुनाफे का सौदा नहीं रहा है.

ऊंट पालक कानाराम के मुताबिक ज्यादा खर्चीला होने की वजह से पशुपालक ऊंट पालन से दूर होते जा रहे हैं. ऊंटनी के प्रसव पर राज्य सरकार ने 10 हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि देने की योजना शुरू की थी, लेकिन अब वो राशि भी ऊंटपालकों को नहीं मिल रही है.

खेती में ऊंट के उपयोग से बढ़ सकती आय

एक ओर जहा लोग जहां इसे घाटे का सौदा मानते हुए ऊंट पालन से विमुख होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जयपुर के एक प्रगतिशील किसान यांत्रिक खेती के जमाने में भी ऊंट से खेती को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं.बिचून गांव में खेती में नवाचार आजमा रहे किसान सुरेन्द्र अवाना का कहना है कि ऊंट को खेती के काम लगाकर जहां खर्च कम किया जा सकता है, वहीं इसके खेती में दूसरे भी कई फायदे हैं.

अवाना से प्रेरणा लेकर आसपास के ऊंटपालक भी खेती में ऊंट का उपयोग कर रहे हैं. इतना ही नहीं अब तक ऊंटनी का दूध ऊंट पालक औने पौने दामों में बेच रहे थे. लेकिन अब उसकी मार्केटिंग कर 100 रुपए प्रति लीटर बेचा जा रहा है. औषधीय गुणों से भरपूर ऊंटनी के दूध की डिमांड भी खूब है.

तेजी से कम हो रहे ऊंट

आंकड़ों की अगर बात करें तो देश के करीब 82 फीसदी ऊंट राजस्थान में पाये जाते हैं. साल 1961 में राजस्थान में ऊंटों की संख्या करीब 10 लाख थी जो अब घटकर महज 2 लाख 13 हजार रह गई है. राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि पशुपालक अब ऊंटनी को गर्भवती ही नहीं होने देते.

दरअसल ऊंटनी का करीब 13 महीने का गर्भकाल होता है और इस दौरान उसे करीब 4 महीने पूरी तरह आराम की जरुरत होती है. चूंकि इस दौरान पशुपालक को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. लिहाजा वह उसके गर्भवती होने से परहेज करता है. बदलते समय के साथ बदलते मायनों ने अब रेगिस्तान के जहाज को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है. लेकिन कुछ किसानों द्वारा इसके संरक्षण की दिशा में उठाए जा रहे कदम सुखद संकेत दे रहे हैं.





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