मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं, अभी आधा काम बाकी है- गीत चतुर्वेदी

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(आशुतोष कुमार ठाकुर)

आमतौर पर देखा जाता है कि हिन्दी में वे कवि (Famous Hindi Poet) लोकप्रिय होते हैं, जो या तो ग़ज़ल लिखते हों या अशआर, फ़िल्मों में गीत लिखते हों या मंच पर छंदबद्ध रचनाएं. गीत चतुर्वेदी इनमें से कुछ नहीं लिखते. वह मुख्यधारा के गंभीर साहित्यिक कवि हैं. वह पूरी तरह मुक्तछंद में लिखते हैं, मंचों पर नहीं जाते, ना ही उनका कोई फ़िल्मी बैकग्राउंड है. इसके बावजूद, गद्य जैसी दिखने वाली उनकी काव्य-पंक्तियां जनता के बीच हाथोंहाथ ली जाती हैं.

उनकी पंक्तियां आपको कमोबेश हर जगह दिख जाएंगी- लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट से लेकर व्हाट्सऐप स्टेटस तक, पत्रिकाओं के पन्नों से लेकर हैंडमेड बुकमार्क्स तक गीत चतुर्वेदी के प्रशंसक हर संभव जगह तक उनकी काव्य-पंक्तियां पहुंचा देते हैं.

उनकी कविताओं की ख़ासियत के बारे में अरबी भाषा की इराक़ी-अमेरिकी कवि दुन्या मिख़ाइल कहती हैं, ‘किसी भी अच्छे कवि की तरह, गीत चतुर्वेदी (Geet Chaturvedi) के पास तीसरी आंख है, जिसकी मदद से वह सिनेमाई तकनीकों का प्रयोग करते हैं और ऐसे दृश्य रचते हैं जो अद्भुत, मासूम और खिलन्दड़ हैं. उनके संवेदना-बोध और शैली की सूक्ष्मता के कारण उनकी कविताओं को पढ़ने में अत्यन्त आनन्द आता है.’

साहित्य के संस्कार (Geet Chaturvedi Family Background)

27 नवंबर, 1977 को मुंबई में जन्मे गीत चतुर्वेदी का नाम ही साहित्यिक है. एक साक्षात्कार में वह कहते हैं, ‘मेरे जन्म से पहले ही पिता ने मेरे लिए यह नाम चुन लिया था. वह चाहते थे कि साहित्य और संगीत के साथ मेरा एक रिश्ता बने. इस तरह देखें, तो जन्म से पहले ही मेरा साहित्य से जुड़ना तय हो गया था. हालांकि, मेरा सिर्फ़ नाम ही गीत है, मैंने कभी कोई गीत नहीं लिखा. मैंने अपना रचनात्मक आनंद कविता और गद्य में पाया.’

गीत चतुर्वेदी को साहित्य के संस्कार उनके परिवार से मिले. तेरह साल की उम्र में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई, जोकि बच्चों के लिए लिखी एक कहानी थी. वह अपने समय की चर्चित बाल पत्रिका ‘टिंकल’ में प्रकाशित हुई थी.

इसके चार साल बाद गीत की पहली कविता मुंबई के ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बाइस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उनकी कविताएं ‘पहल’, ‘उद्भावना’, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ और ‘वागर्थ’ समेत हिन्दी की लगभग सभी प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो गईं.

गीत की कविताएं अंग्रेज़ी और मराठी में अनूदित होने लगी थीं. वरिष्ठ कवियों ने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें तुरंत अपना कविता-संग्रह प्रकाशित कर लेना चाहिए, लेकिन गीत के मन में कुछ और ही चल रहा था.

रचनात्मक वनवास

एक तरफ़ जहां गीत चतुर्वेदी की कविताएं चर्चित और प्रशंसित हो रही थीं, वहीं दूसरी ओर उनके मन में अपनी कविताओं के प्रति एक गहरा असंतोष घर कर रहा था. उनमें कुछ नया करने की तड़प गहराती जा रही थी.

गीत कहते हैं, ‘1997-98 की बात है. मुंबई में फ्लोरा फाउंटेन के पास फुटपाथ पर सेकंड-हैंड किताबें इफ़रात में बिकती थीं. वहां मुझे ‘द पेरिस रिव्यू’, ‘वर्ल्ड लिटरेचर टुडे’, ‘ग्रांटा’ और ‘न्यूयॉर्कर’ जैसी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिकाएं कम क़ीमत में मिल जाते थीं. उनके ज़रिए मेरा समकालीन विश्व साहित्य से परिचय हुआ. उनका अध्ययन करने के बाद मेरी सोच और दुनिया बदल गई. मैंने पाया कि अगर मुझे वैश्विक स्तर पर कुछ बड़ा काम करना है, तो मुझे अपने आपको बदलना होगा, अपने साहित्य को अपग्रेड करना होगा.’

1994 से शुरू हुई गीत की काव्य-यात्रा 1999 में तब रुक गई, जब अचानक उन्होंने लिखना बंद करने का फ़ैसला कर लिया. किसी शोधछात्र की तरह वह विश्व-साहित्य के महान कवियों और रचनाओं का अध्ययन करके वह नोट्स बनाते रहे, अपने लिए अभिव्यक्ति की नई राहें खोजते रहे, एक लेखक के रूप में तैयारी और रियाज़ करते रहे. उनका यह रचनात्मक वनवास छह वर्षों तक चलता रहा.

गीत कहते हैं, ‘छह साल की उस साधना ने मुझे मज़बूत और परिपक्व बनाया. मैं सिद्ध होने का मार्ग खोज रहा था. इससे मेरी बेताबियां थम गईं. मेरी रचनाओं में एक ठहराव आया. मैंने पाया कि कवि होने के लिए सबसे ज़रूरी शब्द है- धैर्य. 2006 में जब मैंने दुबारा लिखना और छपना शुरू किया, तब तक मैं एक नया और अलग तरह का लेखक बन चुका था.’

ख़ुद नहीं बोलते, काम बोलता है

अपने साहित्य में कुछ नया करने का जज़्बा, अभिव्यक्ति के नए ख़तरे उठाने का साहस और वर्षों की साधना ने जल्द ही रंग दिखाया. 2010 में गीत चतुर्वेदी का पहला कविता-संग्रह ‘आलाप में गिरह’ और लंबी कहानियों के दो संग्रह ‘सावंत आंटी की लड़कियां’ और ‘पिंक स्लिप डैडी’ प्रकाशित हुए. और अगले ही वर्ष प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने उन्हें भारत के दस सर्वश्रेष्ठ लेखकों की सूची में शामिल किया.

प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी उनके बारे में कहते हैं, “गीत चतुर्वेदी ने अपने गल्प व कविताओं में अवां-गार्द भाव दिखाया है. उनका अध्ययन बेहद विस्तृत है जो कि उनकी पीढ़ी के लिए एक दुर्लभ बात है. यह पढ़ाई उनकी रचनाओं में अनायास और सहज रूप से गुंथी दिखती है.”

लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद पिछले एक दशक से गीत चतुर्वेदी अपना पूरा समय लेखन को देते हैं. साहित्य की मुख्य धारा में लगातार सक्रिय रहने के बावजूद वह किसी वाद, गुट या गिरोह में शामिल नहीं हैं. हिन्दी के साहित्यिक गलियारों में एक वाक्य अक्सर सुनाई पड़ता है, ‘गीत चतुर्वेदी ख़ुद नहीं बोलते, उनका काम बोलता है.’

प्रतिभा का प्रसार भाषाओं के पार (Geet Chaturvedi Books)

2017 में प्रकाशित गीत चतुर्वेदी के कविता-संग्रह ‘न्यूनतम मैं’ ने उन्हें समकालीन हिन्दी कविता के शिखर कवियों में शुमार कर दिया. इस किताब में 2010 से 2014 तक की कविताएं शामिल हैं. एक गंभीर, दार्शनिक साहित्यिक किताब होने के बावजूद ‘न्यूनतम मैं’ लंबे समय तक ‘दैनिक जागरण बेस्टसेलर लिस्ट’ में शामिल रही. 2019 में आए उनके तीसरे कविता संग्रह ‘ख़ुशियों के गुप्तचर’ ने उनके प्रसार को और बढ़ा दिया. सिर्फ़ एक वर्ष में इस कविता-संग्रह के तीन संस्करण प्रकाशित हो गए.

अनिता गोपालन द्वारा किए गए गीत के नॉवेला ‘सिमसिम’ के अंग्रेज़ी अनुवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संस्था ‘पेन अमेरिका’ ने 2016 में अपना प्रतिष्ठित ‘पेन-हैम ट्रांसलेशन ग्रांट’ पुरस्कार दिया. ग़ौरतलब है कि गीत का नॉवेला यह उपलब्धि पाने वाली महज़ दूसरी भारतीय किताब है और अनिता गोपालन महज़ दूसरी भारतीय अनुवादक। इससे पहले, यह पुरस्कार उदय प्रकाश की किताब ‘पीली छतरी वाली लड़की’ को मिला था.

43 साल के गीत चतुर्वेदी की रचनाएं देश-दुनिया की 22 भाषाओं में अनुवाद हो चुकी हैं. अब तक अमेरिका के छह विश्वविद्यालय गीत की रचनाओं को अपने प्रकाशनों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स पर स्थान दे चुके हैं.

सिर्फ़ चार सुंदर पंक्तियां रचने का स्वप्न

गीत चतुर्वेदी की रचनाओं की रेंज विशाल है. प्रेम, अध्यात्म, स्मृति-विस्मृति, राग-विराग, एलियनेशन, सामाजिक-आर्थिक संदर्भ तथा अप्रत्याशित स्थितियों में भी मानवीय-राजनीतिक चेतना को खोज लेना, उनके साहित्य की मुख्य थीम है.

वह अपनी रचनाओं का दार्शनिक आधार अद्वैत वेदांत तथा बुद्ध-नागार्जुन के शून्यवाद से प्राप्त करते हैं और उनमें आख्यान की उत्तर-आधुनिक डिज़ाइन का प्रयोग करते हैं. गीत चतुर्वेदी, पूर्व और पश्चिम की सांस्कृतिक-साहित्यिक परंपराओं का एक नवीन संगम हैं.

Geet Chaturvedi Quote

अपनी किताब ‘ख़ुशियों के गुप्तचर’ की भूमिका में वह कहते हैं, ‘मेरे पास सपने हैं, लेकिन फूहड़ महत्वाकांक्षाएं नहीं हैं. मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. मैं चाहता हूं कि उम्र पूरी होने तक, मैं चार सुंदर पंक्तियां लिख लूं. जब मैं मरूंगा, वही चार पंक्तियां मुझे कंधा देंगी.’

एक लेखक के रूप में तमाम उपलब्धियाँ पाने के बावजूद जब अपने साहित्यिक सपनों के बारे में गीत यह बात कहते हैं, तो सहज ही उनकी सादगी, सब्र और संयम के बारे में अंदाज़ा लग जाता है। अपनी एक कविता में वह कहते हैं, ‘मैं आधी समझी गई पंक्ति हूँ, अभी आधा काम बाकी है तुम्हारा.’ गीत चतुर्वेदी नामक इस पंक्ति को पूरा समझने के लिए उनकी रचनाओं से गुज़रने के अलावा कोई चारा नहीं.

Geet Chaturvedi Quotes

गीत चतुर्वेदी के प्रसिद्ध कोट्स (Geet Chaturvedi Quotes)

  • कितनी ही पीड़ाएं हैं, जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं – (आलाप में गिरह)
  • दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना एक खराब किस्म की कठोरता है – (आलाप में गिरह)
  • तुम्हें जाना हो, तो उस तरह जाना, जैसे गहरी नींद में देह से प्राण जाता है – (न्यूनतम मैं)
  • प्रेम इस तरह किया जाए कि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो – (न्यूनतम मैं)
  • जब बर्दाश्त से बाहर हो जाएगी भूख, हम अपना भविष्य खा लेंगे – (न्यूनतम मैं)
  • प्रेम में डूबी स्त्री का चेहरा बुद्ध जैसा दिखता है – (ख़ुशियों के गुप्तचर)

माना कि समय बहरा है, किसी की नहीं सुनता
लेकिन वह अंधा नहीं है, देखता सबको है
– (ख़ुशियों के गुप्तचर)

कुछ लोग रोना रोकते हैं, बेहिसाब रोकते हैं, इसलिए नहीं कि वे मज़बूत होते हैं, बल्कि इसलिए कि उनके आसपास कमज़ोर कंधों का कारवां होता है.

– (अधूरी चीज़ों का देवता)

(लेखक आशुतोष कुमार ठाकुर, पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट तथा कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं.)



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