भोजपुरी विशेष – मोरी टुटही मड़इया, सुन्नर लागे !

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आजु जबकि देश के अन्नदाता किसान आ किसानी प जोरदार बहस हो रहल बा, हम अपना गांव में खेत-बधार के हरियरी का बीचे ठाढ़ होके चारू ओरि टुकुर-टुकुर ताकत बानीं. छोट-छोट पउधा अबोध लरिकन लेखा किलकारी मारत बाड़न स आ मन उमगि-उमगि उठत बा उन्हनीं के निहारिके. सोझा किछु साग-खोंटनी मेहरारू निहुरि-निहुरि के साग खोंटत बाड़ी स आ अपना डांड़ में बान्हल धोकरी में ताबड़तोर धइले जात बाड़ी स. जब से सरेह में बूंट-मटर के साग खाए लाएक हो जाला, ओकर खोंटाई होखे लागेला. फेरु त साग-भात आउर साग-लिट्टी लोग बड़ा चाव से खाला. बूंट-मटर के फुनुगी के खोंटइला से जब मेह बरिसेला, त पउधा बढ़ला का संगें-संगें फइलहूं लागेलन स आ झोंप के झोंप ढेंढ़ी निकलेली स. बस फरे-फर. फेरु त जमिके कचरी खा, कल्हारि के घुघुनी बनावऽ भा आगि लहकाके होरहा लगावऽ! कतना लहरात बाड़न स ई हरियर-हरियर आल्हर पउधा! हर पल लुटावे के चाहत. देबे आ खिआवे के भाव. सेवे से नू मेवा मिलेला. सचहूं देबे आ लुटावे में जवन सुख बा, संतोख बा, ऊ लेबे आ पावे में कहां! किसान किसानी-खेती का जरिए अब ले इहे नू करत आइल बा.

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विचार के पटरा
खोजी निगाह दोसरा ओरि मुड़ि जात बाड़ी स. सुन्नर के टिउबेल से पानी मोरी के टेढ़-मेढ़ डंड़ार से होके हवलदार काका के खेत में बहत बा. हवलदार काका अपना भतीजा का संगें पटउवा गहूं में पानी पटावे में लवसान बाड़े. किछु बकुला आ कउवा खेत के बहत पानी में निकलेवाला कीड़ा-मकोड़ा के धर दबोचे का फिराक में मंडरात बाड़न स. तलहीं अचके में मोरी एक जगहा से टूटि जात बिया आ पानी उन्हुका खेत से निकलिके दोसरा के खेत में बहे लागल बा. हवलदार काका एकाएक हड़बड़ाके चिहुंकि उठत बाड़न आ काठ के एगो पटरा उठाके धउरकिए प मोरी बन्न करे खातिर लवलीन हो जात बाड़न. हमरो मन के मोरी टूटि जात बिया, बाकिर एने-ओने बहत पानी के रोके खातिर हम विचार के पटरा नइखीं लगा पावत.कुइआं के बेंग

ओने से निगाह हटाके दूरि-दूरि ले चितवत बानीं. रेलवे लाइन के सामने दरियाव में बटेसर ‘छिओराम-छिओराम’ के सुरलहरी छेड़त पाट प पटकि-पटकि के कपड़ा धोवत बाड़न. उहंवें दरियाव के पानी में किछु चरवाह गाइयो-भइंसि धोवत बाड़न स. घाट पर कवनो राही दिशा-मैदान होके हाथ मांजत बा.
तबे पच्छिम से ‘पी-पी-पी’ के चीख-पुकार मचावत कवनो स्पेशल रेलगाड़ी आके रुकि जात बिया. बुझिला केहू वैकुम काटि देले बा. गांव के दू-तीन गो नवही फाइल लेले उतरत बाड़न स. खेतन में एने-ओने ठाढ़ गंवई लरिका बुढ़िया आन्हीं नियर गाड़ी का ओरि भागत बाड़न स आ उहंवा पहुंचते टरेन के पौदान प टंगाके खिलखिलात एक-दोसरा के निहारत बाड़न स. किछु त सहमल-सहमल निचहीं ठाढ़ होके जात्री लोगन का ओरि आंखि फारि-फारिके चितवत बाड़न स, ठीक ओह तरी , जइसे कवनो सिनेमा देखत होखऽ स. देश-दुनिया से बेखबर ई गंवई नवनिहाल कुइआं के बेंगे नू बाड़न स.

बतकूचन
‘का सोचत बाड़ऽ, बबुआ?’ हवलदार काका खइनी बनावत हमरा बगल में आके खाड़ हो जात बाड़न. ढेर देरी ले पानी में ठाढ़ रहला के कारन उन्हुका हाथ-गोड़ के चाम सिकुरि गइल बा. गमछी के गुलबंद बनाके ऊ कान के ढंपले बाड़न आ तेल में सउनाइल मोटिया के चीकट चद्दर कान्ह प झूलत बिया.
‘किछु ना, काका!’ हम हड़बड़ी में हकलाए लागत बानीं. फेरु सहज होखे के कोशिश में कहत बानीं,’ चलीं, घरहीं चलबि नू?’ ‘ना हो! अबहीं हम फराकित होखे जाइबि.’

हवलदार काका खइनी के फटकिके ओठ का बीचे दबावत दरियाव का ओरि बढ़ि जात बाड़न.बाकिर जात-जात ई कहल नइखन भुलात,’तोहार बतकूचन हमरा बड़ा नीक लागेला,मगर का कहीं, गांव उझंख हो गइल. अब ना केहू नीमन-जबून कहेवाला बा,ना केहू सुनेवाला. हम त बस खेते-बधार में रहेलीं, ए से मन हरियर रहेला.’

हरियर-हरियर महादेव
बूढ़ पुरनिया सुरुजदेव लोहूलोहान होके पच्छिम में ठहरि गइल बाड़न, बाकिर घाम के चेहरा के ललाई अबहुंओं मन में ललक जगावत बिया. किछु मजूर-किसान माथ प घासि के बोझा लेले अपना-अपना घर का ओरि बढ़त बाड़न. कई गो घसिगढ़िन त अबहुंओं खुरपी से खेत सोहे आ घासि गढ़े में मगन बाड़ी. खरिहान में लइका किरकेट खेले में मशगूल बाड़न स. बाकिर पहिलेवाला कुकुहा-के,चिक्का-कबड्डी आ
गुल्ली-डंटा अब कहां! तबहूं कतना जीवंतता बा इहवां. चरवाही से छूटिके रंभात इस्कुलिहा लरिकन-अस गांव का ओरि लवटत गाइयन के झुंड. उछलत-कूदत बाल गोपालन के ओठ से हरसिंगार नियर झरत हंसी-ठिठोली. किलकारी मारत, चहचहात खोंता का ओरि लवटत

बकुला, कउवा आउर कबूतरन के जोड़ा.
धोवल कपड़ा गदहा पर लादिके घर के तरफ लवटत बटेसर भाई. बाकिर हमरा एह हरियरी का बीच से जाए के इचिको मन नइखे करत. चारू ओरि इहवां से उहंवा ले हरियर-हरियर महादेव साक्षात विराजमान बाड़न. मन करत बा कि एह हरियरी में लोटिआए लागीं आ पुक्का फारिके टांसी मारत गा उठीं –

उगे रे मोर सुगना,
माटी में सोनवा!

जहाज के पंछी
अपना सोच के सोनहुला जंजीर के तार-तार करत हमहूं अब सरेह से घर का ओरि लवटत बानीं.मड़ई-टाटी से उठत धुआं हवा का संगें अटखेली करत बाड़न स. आंतर में विचारन के अटखेली अबहुंओं जारी बा. कबो किशोर मन गांव से नगर-महानगर का ओरि भागत रहे,भागहूं के परल, बाकिर अब ओह मिरिग मरीचिका से दूर हरदम-हरदम खातिर गांवें लवटल चाहत बा-

‘जइसे उड़ि जहाज के पंछी, फेरु जहाज पर आवे!’ गंवई मन के दोसरा जगह सुख कहां!

चिरई के जियरा उदास
राह में हुलास चाचा के दुआर प एगो गौरैया के जोड़ा देखत बानीं. गौरैया अपना बुतरू के ठोर में दाना खिआवत बिया. पांखि जामते ई बचवा फुर्र-से उड़ि जाई आ दूर देस जाके आपन दोसर खोंता बना ली. फेरु दूनों के कइसन नेह-नाता! हम ओह गौरैए से अपना गांव के तुलना करत बानीं. कतना असीम लाड़-पियार, सनेह-दुलार देके ई गांव आपन सोन्ह गमक भरल माटी में पालि-पोसिके सेयान कइलस आ फेरु हम नगर-महानगर के भूल-भुलैया में अइसन भटकलीं कि गांव के ऊ पियार-दुलारो भुला बइठलीं. गांव अंकवारी भेंट करे खातिर हमार बाट जोहत रहल. अब लवटलो बानीं, त मशीन बनिके. फेरु मशीन का संगें अदिमी के का रिश्ता!  हीरामन के दुआर प कउड़ का चारू ओरि बइठल लोग किसिम-किसिम के बतकही करत बा. हीरामन के हाथ के हुक्का के गुड़गुड़ी हंसी-ठट्ठा में डूबि गइल बा. परभू
बतकही के नया अध्याय खोलि देले बाड़े. फेरु ऊ अचके एगो फिलिमी धुन छेड़ि देत बाड़े-

‘सोनवा के पिंजड़ा में बंद भइले हाय राम,
चिरई के जियरा उदास!’

टुटही मड़इया सुन्नर लागे
गीत के ई कड़ी हमरा मन के बरछी-अस बेधत बा. हम भितरे-भीतर छटपटा उठत बानीं. ऊ नगर हमरा सोना के पिंजड़ा लागल बा, जहवां हम एगो चिरई लेखा अपना गांव खातिर उदास होके तड़फड़ात रहींले.

दुआर प परल बंसखट का तरफ बढ़ते कुकुर पोंछि हिलाके हमार अगुआनी करत बा. नांद पर खात गाइ के गरदांव में बान्हल घंटी के टुनटुन के मीठ संगीत तन-मन में रचे-बसे लागत बा. बगइचा से कोइलर के बेमौसमी कूक जइसे हमरा गांवें अइला के खुशहाली में गूंजि उठत बा. खूंटा में बन्हाइल बछरू दूध पिए का लालसा में रंभा रहल बा-‘अम्मा!’ फेरु त हम अपना के रोकि नइखीं पावत आ शहरीपन के ओढ़ल लबादा के अपना अस्तित्व से परे फेंकिके लोकगीत के एगो कड़ी गुनगुनाए लागत बानीं-

तोहरी महलिया के ऊंची अटरिया
से डर लागे,
मोरी टुटही मड़इया
सुन्नर लागे !

( लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)





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