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बाल साहित्य: वरिष्ठ साहित्यकार क्षमा शर्मा की कहानी ‘भाई की फरियाद’


बाल मनोविज्ञान हो या स्त्री विमर्श या फिर कोई सामाजिक सरोकार वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार क्षमा शर्मा (Kshama Sharma) की कलम हर मुद्दे पर बड़ी बेकाकी से चलती है. उनका बाल लेखन भारत ही विदेशों में भी चर्चित रहता है. आपने चर्चित बाल पत्रिका ‘नंदन’ में 37 वर्षों तक कार्य किया और लंब समय तक पत्रिका की संपादक रहीं. आपकी कई कहानियों का रेडियो-दूरदर्शन पर नाट्य रूपातंरण भी हुआ है.

‘नेटवर्क 18 साहित्य’ के बाल मंच पर प्रस्तुत है क्षमा शर्मा की कहानी ‘भाई की फरियाद’. एकल होते ज्यादातर परिवारों में जहां बूढ़े-माता की देखभाल एक दयनीय विषय बनता जा रहा है, वहीं ‘भाई की फरियाद’ कहानी में क्षमा शर्मा माता-पिता के प्रति कर्तव्य को बड़ी ही मासूमियत और खूबसूरती से पेश करती हैं. निश्चित ही इस तरह का लेखन बच्चों की नींव में संस्कार और भावना से भरने का काम करता है.

भाई की फरियाद
– क्षमा शर्मा

नाम तो था कुछ और लेकिन लोगों ने नाम रख दिया था-दयालु सिंह. लम्बा-चौड़ा, बड़ी-बड़ी मूछें, कामदार लम्बी नोंक वाली जूतियां. और उनसे भी ज्यादा बड़ी- बड़ी आंखें. दरबार में लोग कहते कि यों तो राजा का नाम दयालु सिंह है, मगर आंखें तो देखो कितनी बड़ी और डरावनी हैं. देखता है तो लगता है कि खा ही जाएगा.

डरावनी..? हमें तो बहुत सुंदर लगती हैं. जैसे किसी ने आंखों में दो बड़ी-बड़ी मछलियां जड़ दी हों–एक कहता.

अजी चुप भी करो, मालूम नहीं राजा को मछली खाना कितना पसंद है, पता चल गया तो अपनी ही आंखों की खैर नहीं रहेगी–दूसरा बोलता.

तीसरा कहता-चलो छोड़ो आंखों को, न जाने किसने तो राजा को यह सलाह दी है कि इतना मोटा मोटा काजल लगाए.

उनकी बातें सुनकर पहले से चुप नहीं रहा गया-‘अरे चुप- चुप किसी ने शिकायत कर दी, तो खैर नहीं. ये राजा की मम्मी जी का तोहफा है. वह कहती थीं कि जितना गहरा काजल होगा, आंखों की देखने की ताकत उतनी ही होगी.’

दूसरा हंसकर कहने लगा-‘तो क्या जो काजल नहीं लगाते हैं, वे देख नहीं पाते.’

अब ये तो तुम उनकी मम्मी साब से ही जाकर पूछो.

अरे तब तो हो सकता है समय से पहले ही ऊपर जाना पड़ेगा. क्योंकि वह तो सालों पहले वहां चली गईं. हां, वहां बैठीं अगर हमारी बातें सुन रही होंगी और राजा से शिकायत कर दी, तो हमारी खैर नहीं.

बाहर प्रजा के लोग भी राजा से भय खाते थे. क्या पता कब नाराज हो जाए. लेकिन दयालु सिंह एक न्यायप्रिय राजा था.

एक दिन दरबार लगा हुआ था. सभी मंत्रिपरिषद के सदस्य, राजा के सेवक आ चुके थे. वे एक-दूसरे से बतिया रहे थे. तभी सुनाई दिया –’महाराजाधिराज की जय हो, हमारे महाराज अमर रहें, जब तक सूरज-चांद रहेगा, राजा तुम्हारा नाम रहेगा, दयालु सिंह का नाम रहेगा, दयालु सिंह जिंदाबाद, राजा की ताकत जिंदाबाद, हमारा राजा कैसा हो-महाराज दयालु सिंह जैसा हो.’

यानि कि महाराज पधार रहे थे. मंत्रिमंडल के सदस्य और दरबारियों ने उनका स्वागत किया. लेकिन जैसे ही राजा सिंहासन पर बैठा, दरबारियों के होश उड़ गए. ये क्या राजा को अपनी मूंछों पर इतना गर्व था, वे कहां गईं..? कल तक तो थीं, कटवा क्यों दीं! मगर कोई पूछे कैसे. राजा की मरजी जो चाहे सो करे.

राजा आकर सिंहासन पर बैठ गया. और हमेशा की तरह काजल लगी बड़ी- बड़ी आंखों से इधर-उधर देखने लगा कि अचानक बाहर से जोर-जोर से रोने की आवाज सुनाई देने लगी. दयालु सिंह ने इशारा किया तो रोने वाले आदमी को अंदर लाया गया.

वह एक गरीब किसान था. उसकी फसल जमींदार के गुंडे काट ले गए थे. उसने बताया कि जैसे-तैसे जमींदार से बचकर वह यहां तक पहुंचा है. राजा ने हुक्म दिया कि सेना के लोग फौरन जाकर जमींदार से फसल की कीमत वसूल करके किसान को दें. किसान के जाने के बाद एक महिला के रोने की आवाज आई. उसे अंदर लाया गया, तो वह एक बूढ़ी महिला थी. उसके बेटे-बहू ने उसे घर से निकाल दिया था.

राजा ने उसकी बात सुनी तो बहुत गुस्सा आया. फौरन शहर कोतवाल से कहा कि बुढ़िया माई के बेटे को पकड़कर दरबार में पेश किया जाए. उसकी कठोर सजा राजा खुद तय करेगा. वे बच्चे जो अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल नहीं कर सकते, उन्हें कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए. इसी तरह एक-एक करके लोग आते रहे. राजा उनकी फरियाद सुनकर उनकी समस्या हल करने का आदेश देता गया.

अचानक राजा के चेहरे का रंग बदल गया. एक आदमी उसके सामने हंसता हुआ खड़ा था. राजा की समझ में नहीं आया कि वह आदमी हंस क्यों रहा था. वैसे भी हंसते हुए आदमी का दरबार में क्या काम. राजा के सामने तो वे ही लोग आते थे जो किसी परेशानी में फंसे होते थे और रोते थे. हंसता हुआ फरियादी राजा ने पहली बार देखा था.

फरियादी ने राजा को प्रणाम किया. फिर जोर से हंसा. उसे हंसते देख राजा को गुस्सा आ गया. उसने डांटते हुए कहा- ‘क्या तुम्हें शिष्टाचार के मामूली तौर-तरीके भी नहीं मालूम हैं. हमारे सामने खड़े होने से पहले यह पता करके नहीं आए कि कैसे खड़ा होना है.’

जी महाराज गलती माफ हो! मगर मैंने ऐसा क्या किया–उस आदमी ने पूछा. उसका हंसना तो बंद हो गया था मगर अब वह मुसकरा रहा था.

पूछते हो क्या किया जैसे मालूम ही नहीं–राजा ने क्रोध से कहा.

-नहीं, महाराज सचमुच मालूम नहीं.

‘खामोश! किस की इतनी हिम्मत है जो हमारे सामने इस तरह से हंस सके, जैसे तुम हंस रहे हो. यहां तो सब अपनी कोई न कोई परेशानी लेकर रोते हुए आते हैं. मगर तुम पहले व्यक्ति हो जो हंसते हुए आए हो. क्या तुम किसी बात से बहुत खुश हो. अगर खुश हो तो हमारे दरबार में फरियाद लेकर आने की क्या जरूरत पड़ गई’ -राजा ने कहा.

राजा की बात सुनकर आदमी चुप हो गया. फिर सोचते हुए बोला- महाराज! मैं भी रोते हुए आ रहा था. मगर रास्ते में कुछ ऐसी घटना घटी कि हंसने लगा.

-अच्छा, हमें भी बताओ कि ऐसा क्या हुआ कि रोते-रोते हंसने लगे. और अब हंसते ही जा रहे हो.

महाराज आपका नाम तो दयालु सिंह है, आपके काम भी ऐसे हैं कि संसार आपकी तारीफ करता है मगर..

-मगर क्या?

महाराज अभी मैं आ रहा था तो एक गरीब आदमी आपके दरबानों से कह रहा था कि उसे अंदर जाने दें मगर वे नहीं आने दे रहे थे–उस आदमी ने कहा.

-ऐसा भला क्यों?

महाराज वह आदमी कह रहा था कि आपने दरबानों को उसकी मदद करने का हुक्म दिया था. मगर वे उसके दुश्मन की मदद करने लगे. आपने हुकुम दिया था कि उस आदमी के मकान पर जिन ताकतवर पड़ोसियों ने कब्जा कर लिया है, उनसे मकान फौरन खाली कराया जाए. दरबान उस पड़ोसी से मिल गए. मकान तो खाली हुआ नहीं, उस बेचारे का सारा सामान भी पड़ोसी उठा ले गए.

उसकी बातें सुनकर दयालुसिंह गुस्से से कांपने लगा. उसके दरबानों की यह हिम्मत. उसने फौरन दरबानों को पकड़वाया और उन्हें कारागार में भिजवा दिया. उसके बाद राजा ने पूछा-मगर इसमें हंसने की क्या बात थी.

महाराज मैं खुद पर ही हंस रहा था. सोच रहा था कि जब मेरे सामने इतनी बड़ी सचाई आ गई है कि जिन लोगों को आप मेरी मुश्किल हल करने भेजेंगे वे ही मेरे दुश्मन हो जाएंगे तो मेरा यहां आने का क्या फायदा.

कोई बात नहीं तुम हमें अपनी समस्या बताओ और अपने घर जाओ. अगर समाधान न हो तो कल फिर आना.

महाराज मेरे तीन भाई हैं. पिता जी की जब मृत्यु हुई थी, तब तय हुआ था कि हमारी मां बारी–बारी से सबके पास रहेंगी. लेकिन महाराज..

लेकिन क्या..तुम्हारे दूसरे भाई मां को नहीं रखते?

नहीं महाराज, अगर ऐसा होता तो मुझसे सौभाग्यशाली बेटा कौन सा होता, लेकिन बड़े भाई हैं कि वह मां को दूसरे भाइयों के पास जाने ही नहीं देते. वह समझते हैं कि मां की सबसे अच्छी देखभाल वही कर सकते हैं. हम तीनों भाई परेशान हैं. चाहते हैं कि हमें भी मां की देखभाल और सेवा का अवसर मिले, लेकिन न भाई भेजते हैं न मां आती हैं. हम चाहते हैं कि आप हमारे बड़े भाई को समझाएं.

उस आदमी की बातें सुनकर राजा की आंखों में आंसू आ गए. आंखों में लगा काजल बहकर गालों पर बहने लगा. बाकी दरबारी भी वाह-वाह करने लगे.

राजा ने कहा कि जीवन में पहली बार वह इस तरह की बातें सुन रहा है. भाई इस बात पर लड़ते हैं कि कहीं माता-पिता की जिम्मेदारी उन पर न आ जाए. यहां भाई इस बात पर शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें मां की देखभाल नहीं करने दी जा रही. अगले दिन राजा ने चारों भाइयों को दरबार में बुलाकर सम्मानित किया. वहीं चारों भाइयों ने तय किया कि अब अलग-अलग रहने के मुकाबले वे इक्ट्ठे रहेंगे जिससे कि मां की देखभाल भी हो सके और सब प्यार से रह सकें.

(साहित्य और पत्रकारिता जगत में क्षमा शर्मा एक स्थापित हस्ताक्षर हैं. उनके कई बाल उपन्यास और बाल कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके लेखन पर एक विश्वविद्यालय में शोधकार्य सम्पन्न हो चुका है और कई विश्वविद्यालयों में शोधकार्य चल रहा है.)



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