पुस्‍तक अंश: बिहार को जानने के लिए एक ज़रूरी किताब ‘रुकतापुर’

0
1


हाल में आई किताब ‘रुकतापुर’ (Ruktapur) काफी चर्चा में है. बिहार (Bihar) के वंचित समाज के हालात को बयां करती इस किताब को लेखक, पत्रकार पुष्यमित्र (Pushyamitra) ने लिखा है. इसमें हालात का तथ्यपरक विश्लेषण (Factual Analysis) किया गया है. यह किताब इसलिए भी खास है कि इसमें बिहार के उन आम लोगों के हालात को कलमबंद किया गया है, जो विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रयत्‍नशील तो हैं, मगर उनकी राहों में कितनी ही बाधाएं हैं. इसके बहाने बिहार के वंचित तबके की कहानियों को शब्‍द दिए गए हैं और सच को सामने लाने का प्रयास किया गया है. प्रस्‍तुत है इस किताब का एक अंश-

(रुकतापुर : पुस्‍तक अंश)
यह भी 2015 के विधानसभा चुनाव की ही कहानी है. हम गया जिले के इस्माइलपुर, बहादुरपुर, बिगहा से चुड़ावन नगर गांव की तरफ जा रहे थे. रास्ते में एक मोड़ के पास हमें युवकों की टोली नजर आई. यह टोली दो-तीन टुकड़ों में बैठकर ताश खेल रही थी. ब्रे पर हाथ आजमाया जा रहा था. यह देखकर मुझे अपने गांव का वह दौर याद आ गया जब युवकों के पास कोई काम नहीं होता था और दुपहरी काटने के लिए कोट पीस या ब्रे खेलने से बेहतर कुछ नहीं होता था. कॉलेज से डिग्री लेकर नौकरियों के लिए आवेदन देने और रिजल्ट का इन्तजार करने के बीच का वक्त कुछ इसी तरह काटा जाता था. बाद में बड़े-बुजुर्गों की टिप्पणियां सुनीं कि यह खेल आपका वक्त ही नहीं काटता, बल्कि आपको निकम्मा भी बना देता है. ऐसे में जब यहां युवकों को इस खेल में मग्न देखा तो ठहर गया. सोचा, कुछ बातें कर ली जाएं.

सारे युवक भुइयां समुदाय के थे. मैंने उनसे पूछा कि भाई रोजी-रोजगार के बदले ताश क्यों खेल रहे हो. तो युवक कहने लगे, क्या करें, नीतीश जी ने पहाड़ तोड़ने पर रोक लगवा दिया है, सब काम-धंधा चौपट हो गया. उनका मतलब था कि पहले इस इलाके में स्टोन क्रशर का उद्योग काफी फल-फूल रहा था, मगर कुछ साल पहले नीतीश कुमार की सरकार ने उस पर रोक लगा दी है. मैंने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि यह तो अच्छी बात है. पहाड़ खत्म हो जाएंगे तो क्या आपको अच्छा लगेगा? मगर वे लोग सामूहिक रूप से इस बात पर अडिग थे कि नीतीश कुमार ने उन लोगों की रोजी-रोटी छीन ली है और इस चुनाव में उनको मजा चखाया जाएगा. उन्हें पर्यावरण का मसला समझाना मुश्किल काम था.बात बदलने की नीयत से मैंने पूछा कि अब क्या काम करते हो? इस पर उन लोगों ने कहा कि धान के सीजन में गांव में जो खेती-मजदूरी का काम मिलता है, कर लेते हैं. बरसात का मौसम खत्म होता है तो दाउदनगर की तरफ निकल जाते हैं. वे लोग शायद बरसात खत्म होने का ही इन्तजार कर रहे थे, ताकि दाउदनगर जाकर वहां के ईंट-भट्ठों में काम कर सकें. बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर में ईंट-भट्ठों का उद्योग काफी फल-फूल रहा है. ये लोग वहीं जाते होंगे. यानी मौसमी पलायन का एक नमूना. मगर दाउदनगर हो या देश का कोई अन्य इलाका ईंट-भट्ठे मजदूरी करने के लिहाज से सबसे बुरी जगह होते हैं. वहां काम और मजदूरी का कोई ढंग का हिसाब-किताब नहीं होता. लोगों को बहुत बुरे हाल में रहना पड़ता है. ईंट-भट्ठों के मालिक अक्सर यहां काफी दबंग किस्म के होते हैं. मजदूरों के साथ मारपीट आम बात है. फिर ये लोग ऐसी जगह क्यों जाते हैं?

ये भी पढ़ें – Ismat Chughtai Birth Anniversary: विद्रोही लेखिका इस्‍मत चुग़ताई

उन्होंने कहा, क्या करें. गांव में रोजी-रोटी का कोई इन्तजाम हो तब न. मनरेगा भी बन्द है. मनरेगा रहता था तो कुछ काम मिलता था. मुझे वह चुनावी बहस याद आ गई, जब महागठबन्धन के लोगों ने कहा था कि भाजपा केन्द्र सरकार ने मनरेगा के पैसों पर रोक लगा दी है. पिछले डेढ़-दो साल से पूरे राज्य में मनरेगा का काम लगभग ठप था. उस दौरान हमारे पीएम नरेन्द्र मोदी ने मनरेगा का मजाक उड़ाते हुए जो कहा था, वह कोरोना के दौर में खूब वायरल हुआ. वे संसद में कांग्रेस पर यह कटाक्ष करते नजर आ रहे थे कि मनरेगा आपकी विफलताओं का स्मारक है, मैं इसे कभी बन्द नहीं करूंगा. मगर कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के वक्त जब असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, खासकर प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा की कहानियां सामने आईं तो केन्द्र समेत सभी राज्य सरकारों को उसी मनरेगा की शरण में जाना पड़ा. केन्द्र सरकार ने मनरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बजट जारी किया.

बिहार सरकार ने भी कहा कि वह साल 2020 में मनरेगा के जरिए 24 करोड़ मानव श्रम दिवस का काम सृजित करने जा रही है. यानी कम से कम 24 लाख मजदूरों को सौ दिन का रोजगार इससे मिल सकता है. जबकि पिछले साल बिहार सरकार सिर्फ 20 हजार मजदूरों को ही सौ दिन का रोजगार उपलब्ध करा पाई थी. कुल 12.34 करोड़ मानव श्रम दिवस ही सृजित हो पाया था. वैसे तो मनरेगा भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है. मजदूरी का पेमेंट बैंक खाते में होने के बावजूद इसमें कई तरह की गड़बड़ियां सामने आती हैं. मगर भ्रष्टाचार के बावजूद अगर ठीक से काम हो तो इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आते हैं, यह हमने पहले देखा भी है. नीतीश कुमार सरकार के पिछले कार्यकाल में एक वक्त ऐसा भी आया था जब मनरेगा में लोगों को ठीक-ठाक काम मिलने लगा था और यहां के मजदूरों ने बाहर जाना बन्द कर दिया था. तब पंजाब और हरियाणा के किसान बिहार आकर बैठे रहते थे, मजदूरों की खुशामद करते थे. उन्हें अपने यहां ले जाने के लिए मोबाइल और टीवी गिफ्ट करते थे. उस वक्त न सिर्फ दूसरे राज्यों में बल्कि बिहार में भी मजदूरी की दर बढ़ी. इस कोरोना काल में भी ऐसा ही दिखा, जब देश के लगभग हर इलाके की लग्जरी बसें मजदूरों को लेने बिहार के गांव-गांव में घूमती नजर आईं. लॉकडाउन की वजह से अचानक मजदूरों के लौट आने से उनके लिए दिक्कत खड़ी हो गई थी.

मगर बाद के दिनों में मनरेगा पर जोर कम होने लगा और मनरेगा मजदूरी की दर भी समय के हिसाब से नहीं बढ़ी. पेमेंट में भी काफी वक्त लगने लगा. इससे मनरेगा का काम धीमा होता चला गया और बिहार में फिर से पलायन की समस्या उत्पन्न हो गई. अब तो मौसमी पलायन के सिवा और कोई विकल्प नहीं. गांव की खेती में इतना काम नहीं कि मजदूरों के लिए साल भर का इन्तजाम हो सके. यही वजह है कि बिहार की एक बड़ी आबादी दाऊद नगर से लेकर श्रीनगर तक और मदुरई से लेकर भडूच तक जाकर बहुत ही निम्न किस्म की मजदूरी करने के लिए मजबूर है. 2015 की उस यात्रा के बाद कई जगह ऐसे मजदूर मिले जो दो-चार महीने के लिए अपना घर-बार छोड़कर हजारों किमी. दूर निकल जाते हैं. 2018 में तो हद हो गई.

ये भी पढ़ें – Munshi Premchand Birth Anniversary: आम लड़के की खास कहानी

2018 में जून के महीने में एक रोज अचानक फेसबुक पर एक स्टेटस दिखा. ‘गुड न्यूज—सहरसा जंक्शन रेवेन्यू कलेक्शन में नम्बर वन.’ यह स्टेटस बड़ा अपीलिंग था. सहज ही इस खोज में जुट गया कि आखिर कोसी अंचल का यह छोटा सा जंक्शन रेवेन्यू में नम्बर वन कैसे हो गया. गूगल किया तो पता चला कि 13 से 17 जून की अवधि में इस जंक्शन से दो करोड़ रुपए के टिकट कटे. इस अवधि में पटना, मुगलसराय, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर जैसे बड़े स्टेशनों पर भी टिकट की बिक्री यहां के मुकाबले काफी कम थी. स्टेटस लिखने वाला सहरसा का ही युवक था. वह इस उपलब्धि की वजह से गर्व से भरा था और साथ ही रेलवे से उसने मांग की थी कि रेवेन्यू कलेक्शन को देखते हुए सहरसा जंक्शन पर यात्री सुविधाएं बढ़ाई जाएं. मगर यह सूचना देखकर मेरा मन भारी होने लगा. उस स्टेशन से रेलयात्रा करने वाले ज्यादातर लोग मजदूर तबके के होते हैं. पता चला कि उन दिनों पंजाब-हरियाणा में धनरोपनी का सीजन था, सारे मजदूर वहीं जा रहे थे. अगर पांच दिन की अवधि में इस स्टेशन से दो करोड़ के टिकट कटे हैं, तो इसका मतलब है इस अवधि में कम से कम 60 हजार मजदूर यहां से बाहर गए होंगे. बाद के दिनों में खबर आई कि दरभंगा जंक्शन पर भी यही हालत थी.

कटिहार, समस्तीपुर, हाजीपुर, जयनगर, मोतिहारी, बेतिया आदि उत्तर बिहार के हर छोटे स्टेशन पर उस दौरान मजदूरों की तकरीबन वैसी ही भीड़ थी. वे हर कीमत पर पंजाब या हरियाणा चले जाना चाहते थे, क्योंकि वहां धनरोपनी की अच्छी मजदूरी मिलती है. वहां के किसान बिहारी मजदूरों का सम्मान करते हैं. उन्हें सुविधाएं देते हैं. इसलिए हर साल रोपनी और धनकटनी के मौके पर पूरे राज्य से लाखों मजदूर हजारों किमी. दूर मजदूरी के लिए चले जाते हैं और दो-तीन महीने रहकर लौट आते हैं. 2017 में भी यही हुआ था. भीषण बाढ़ के बाद जब खेतों में कुछ नहीं बचा तो मजदूर दीवाली-छठ जैसे पर्वों का मोह छोड़कर पंजाब चले गए. उन दिनों किसी रिपोर्ट के सिलसिले में जब मैं सहरसा स्टेशन से होकर गुजर रहा था, तो वहां की भीड़ देखकर स्तंभित रह गया. पूरे स्टेशन पर एक इंच भी ऐसी जगह नहीं थी, जहां इनसान बैठा या लेटा न हो. पता चला कि पिछले एक हफ्ते से इस स्टेशन पर हंगामा हो रहा था. हजारों मजदूर रोज ट्रेनों का परिचालन बन्द करवा रहे थे. दो-दो दिनों से दिल्ली का टिकट लेकर स्टेशन पर बैठे मजदूर कह रहे थे कि इन्हें किसी ट्रेन में जगह नहीं मिलती. उस वक्त भी सहरसा ही नहीं, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, कटिहार जैसे उत्तर बिहार के दूसरे स्टेशनों के भी ऐसे ही हालात थे. दीवाली और छठ पर्व नजदीक होने के बावजूद रोजाना औसतन एक से सवा लाख लोग राज्य से पलायन कर रहे थे.

नवहट्टा के संजय कुमार महतो ने बताया कि वे पंजाब के होशियारपुर जा रहे हैं, वहां धनकटनी का सीजन शुरू होने वाला है. उम्मीद है कि वहां उन्हें कोई काम मिल जाएगा. यहां तो बाढ़ में सब डूब गया, घर में खाने के लिए कुछ नहीं है. यहां रहेंगे तो भूखे मर जाएंगे. संजय अपनी पत्नी और बच्चों को भी साथ ले जा रहे थे. उनके साथ यात्रा करने वाले मधेपुरा के सुखलाल बोले, ‘लेबर की इतनी खराब स्थिति कभी नहीं थी. पहले ठेकेदार खुशामद करते थे. एडवांस देते थे, मोबाइल खरीदकर देते थे, तब मजदूर जाता था. इस बार तो लेबर ही ठेकेदार का खुशामद कर रहा है. हम लोग तो किसी ठेकेदार के साथ नहीं हो पाए. रिस्क लेकर जा रहे हैं, इस उम्मीद में कि कम मजदूरी वाला ही सही, काम तो मिल जाएगा.’

ये भी पढ़ें – ‘कर रहा था ग़म-ए-जहां का हिसाब’, आज पेश हैं उदासी पर अशआर

मुजफ्फरपुर के सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश से जब मैंने इस मसले पर बातचीत की तो उन्होंने कहा, ‘उत्तर बिहार में इस साल (2017) आई भीषण बाढ़ के बाद यहां रोजगार की कोई सम्भावना बची नहीं है. मनरेगा का काम ठप होना और बालू खनन पर रोक (बारिश के दिनों में बिहार में बालू खनन पर रोक लग जाती है) इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं. मनरेगा के पहले के जमाने में ऐसी आपदा आने पर सरकार रोजगार बढ़ाने वाली योजनाओं पर काम करती थी, लेकिन अब बिहार की राजनीतिक सत्ता ने इस विषय में सोचना ही छोड़ दिया है. पलायन आसान समाधान है, लेकिन इसके दीर्घकालिक समाधान के बारे में सोचना होगा.’ उस वक्त मैंने अपने साथियों से पता करवाया तो मालूम हुआ कि इस दौरान सहरसा से 15 हजार, समस्तीपुर से 20 हजार, मधुबनी से 5 हजार, जयनगर से 4 हजार, दरभंगा से 7 हजार, सीतामढ़ी से 5 हजार, कटिहार से 16 हजार और मुजफ्फरपुर से 20 हजार मजदूरों ने दिल्ली और पंजाब का टिकट कटाया था. दरभंगा जंक्शन पर हमारे एक साथी को एक ऐसा युवक मिला, जिसके दादा भी मजदूरी के लिए पंजाब जाते रहे थे. फिर पिता ने जाना शुरू किया और अब वह जा रहा है. यानी तीन पीढ़ियों से पलायन की परम्परा जारी है.

मगर जैसा कि हमने बाद में कोरोना और लॉकडाउन के दौरान देखा कि मजदूरों के पलायन और उनकी काम की परिस्थितियों के बारे में अब तक किसी सरकार के पास कोई सुस्पष्ट जानकारी नहीं है. किसी को पता नहीं था कि कितने मजदूर बिहार से पलायन करते हैं और वे इस दौरान कहां रहते हैं, उन्हें कितनी आमदनी होती है. उनकी रोजगार की परिस्थितियां कैसी हैं. हम सबने देखा कि लॉकडाउन ने अचानक इस पूरी स्थिति को उघारकर रख दिया है. हर बड़े शहरों से इन मजदूरों की भीड़ निकल पड़ी, अपने घर जाने के लिए. गरीब-लाचार लोगों का हुजूम सड़कों पर था. कंधे पर बैग, गोद में और ऊंगलियां थामे बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग. सबके सब पैदल ही घर जाने का मंसूबा बांधकर निकल पड़े. पहले तो सरकार के लोगों ने यह प्रोपोगेंडा फैलाया कि इन मजदूरों को भड़काकर घर भेजा जा रहा है, ताकि मोदी सरकार द्वारा लगाए गए लॉकडाउन को फेल किया जा सके. मगर बाद के दिनों में यह समझ में आया कि इनमें से ज्यादातर लोगों के पास तो रहने के लिए कोई ठिकाना ही नहीं है, जो निर्माण मजदूर थे, वे कंस्ट्रक्शन साइट पर रहते थे और जो छोटी फैक्ट्रियों के लेबर थे, वे उसी कैम्पस में रहते थे. जब तालाबन्दी हुई तो वे अचानक बेघर हो गए. जिन कम्पनियों में वे असंगठित मजदूर के रूप में काम करते थे, उन्होंने उन्हें निकाल बाहर किया, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं सरकार उन पर लॉकडाउन की अवधि में मजदूरी देने का दबाव न बनाए, जो मजदूर छोटे-छोटे किराए के कमरों में रहते थे, उन्हें उनके मकान मालिकों ने बाहर कर दिया. ढाई महीने का लॉकडाउन था और उनके लिए एक-एक दिन काटना मुश्किल था.

लिहाजा कुछ लोगों ने साइकिल खरीद ली और उसी पर सवार होकर निकल पड़े. ऐसे कई लोगों की कहानियां बाद में सुर्खियों में आईं और साइकिल से अपने पिता को लेकर घर लौटने वाली एक किशोरी को तो सरकार और राजनीतिक पार्टियों ने वीरता का ब्रांड ऐंबेस्डर भी बना डाला. बाकी कभी पैदल, कभी ट्रकों से और कभी छोटी-छोटी गाड़ियों से हजार-डेढ़ हजार किमी. का सफर तय करने लगे. लॉकडाउन के सवा महीने बाद भी जब यह सिलसिला बन्द नहीं हुआ, जब सड़कों पर मर रहे मजदूरों की कहानियां रोज सामने आने लगीं. तब पहली मई से केन्द्र सरकार ने इनके लिए स्पेशल ट्रेनों का परिचालन शुरू किया. हालांकि वह परिचालन भी इतना लचर रहा कि इन ट्रेनों में ही भूख और गर्मी से, ट्रेन की लेटलतीफी से 80 मजदूर मर गए. फिर आखिरकार सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 लाख के करीब मजदूर बिहार लौटे. तब जाकर इनकी संख्या का कुछ अन्दाजा लगा. पहले बिहार सरकार इन मजदूरों की वापसी के पक्ष में नहीं थी. वह चाहती थी कि लॉकडाउन के दौरान वे जहां हैं, वहीं रहें. सरकार को ये मजदूर बोझ लगते थे, जो अपनी कमाई से अब तक बिहार के गांवों को समृद्ध कर रहे थे.

मार्च, 2020 तक बिहार सरकार का रवैया पलायन को लेकर काफी लचर था. मार्च के पहले हफ्ते में बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी का वह बयान काफी विवादित हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि चांद पर भी नौकरी निकल जाए तो बिहारी वहां भी पहुंच जाएंगे. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधान परिषद में कहा था कि नौकरी या रोजगार के लिए बिहार से लोगों का बाहर जाना शर्मिंदगी की बात नहीं है. बिहारी अपने हुनर की वजह से बाहर रोजगार पाते हैं. मगर उस वक्त उन दोनों ने यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि बिहार के मजदूर देश के दूसरे राज्यों में किन परिस्थितियों में रहते हैं. 2020 में ही फरवरी माह में इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज, मुंबई ने बिहार और उत्तर प्रदेश से पलायन करने वाले लोगों पर एक विस्तृत अध्ययन किया था. उसकी रिपोर्ट इस समस्या को समझने के लिए एक इशारा थी, जो कोरोना काल में विस्फोट कर गई. इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के हर दो में से एक परिवार के लोग किसी न किसी वजह से राज्य के बाहर पलायन करते हैं. बिहार से दूसरे राज्य की तरफ पलायन करने वाले लोगों में 80 फीसदी या तो भूमिहीन हैं, या उनके पास एक एकड़ से भी कम जमीन है. मतलब साफ है कि खेती के जरिए पेट पालना उनके लिए असम्भव है. पलायन करने वाले 85 फीसदी लोगों ने दसवीं तक की भी पढ़ाई नहीं की. ऐसे में यह एक भ्रम है कि लोग अपने टैलेंट की वजह से बाहर बुलाए जाते हैं. 90 फीसदी लोगों को अकुशल मजदूरी का काम मिलता है. बिहार से बाहर जाकर नौकरी या रोजगार करने वाले लोग इतने सस्ते मजदूर साबित होते हैं कि वे साल में औसतन 26020 रुपए ही कमा पाते हैं, जबकि देश की राष्ट्रीय औसत प्रति व्यक्ति आय 1,35,050 रुपए तक पहुंच गई है. यानी बिहारी मजदूरों के मुकाबले पांच गुनी.

ये भी पढ़ें – ‘कर रहा था ग़म-ए-जहां का हिसाब’, आज पेश हैं उदासी पर अशआर

मतलब यह कि बिहार में आधे लोगों के पास दो-ढाई हजार रुपए प्रतिमाह का रोजगार पाने के अवसर नहीं हैं. सच यही है कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जोड़ी के लगभग 15 साल तक राज करने के बावजूद बिहार में रोजगार की सम्भावनाओं का समुचित विकास नहीं हुआ. बिहार सरकार द्वारा 2020 में जारी आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भी इस कड़वी सचाई को उजागर करती है. उस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में सिर्फ 11.9 फीसदी लोगों के पास नियमित रोजगार उपलब्ध है. ऐसे मजदूर जिन्हें कभी रोजगार मिलता है, कभी नहीं उनकी संख्या 32.1 फीसदी है. इन आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 45 फीसदी लोगों की आजीविका का आधार खेती है. मगर राज्य में 65 फीसदी लोग भूमिहीन हैं और जिनके पास जमीन है भी उनमें से अधिकतर लघु एवं सीमान्त किसान हैं. बिहार में कुल 1.40 करोड़ भूस्वामियों में से 1.28 करोड़ सीमान्त किसान हैं. यानी उनके पास औसतन 0.25 हेक्टेयर जमीन ही है. राज्य के जीडीपी में खेती का हिस्सा भी 17.1 फीसदी ही रह गया है.

जहां तक उद्योगों का सवाल है, राज्य में कुल उद्यमों की संख्या सिर्फ 2908 है. ये सभी मिलकर राज्य के सिर्फ एक लाख लोगों को ही रोजगार दे पाते हैं, जिनकी औसत आय भी बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रतिमाह है. ऐसे में राज्य के लोगों के पास रोजी-रोजगार के लिए पलायन के सिवा विकल्प ही क्या है. अब जबकि कोरोना काल में 30 लाख से अधिक मजदूर बिहार लौट आए और वे यहीं रहना चाहते थे तो सरकार के पास उन्हें रोकने के लिए जुबानी वायदों के अलावा कुछ नहीं था. लिहाजा उनमें से ज्यादातर फिर से पलायन कर गए और रिवर्स माइग्रेशन का दावा फरेब साबित हुआ. जबकि मुख्यमंत्री बार-बार कह रहे थे कि जो लोग यहां रहना चाहते हैं, उन सबको रोजगार दिया जाएगा. इन मजदूरों की स्किल मैपिंग हो रही है. मगर ऐन लॉकडाउन के बीच इन मजदूरों का पलायन भी शुरू हो गया. यह प्रदेश रोजी-रोजगार के मामले में इतना ठहरा हुआ है कि माहौल बदलने में काफी वक्त लगेगा. फिलहाल तो बिहार एक रुकतापुर स्टेशन है, जहां प्रवासी मजदूर सिर्फ पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह और कोरोना जैसी आपदाओं के वक्त ही लौटकर आते हैं, फिर वापस लौट जाने के लिए.

किताब का नाम – रुकतापुर
लेखक –  पुष्यमित्र
प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन





Source link

Advertisement

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here