दिल्ली की पराठें वाली गली जहां मिलते हैं 25 किस्म के पराठें, जानें सब कुछ

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(डॉ. रामेश्वर दयाल)

पुरानी दिल्ली (Old Delhi) की गली परांठे वाली (Parathe wali gali) का नाम किसने नहीं सुना होगा. यह नाम आइकन बन चुका है. इस गली की विशेषता यह है कि नाम के अनुसार वहां आज भी करीब डेढ़ सौ साल से गरमा-गरम, देसी घी में तले परांठे परोसे जा रहे हैं. अब इस गली में परांठों की दुकान तो कम हो गई है, लेकिन उनकी वैरायटी बढ़ गई है. इसी वैरायटी का मजा चखने के लिए दिल्ली के अलावा देश-विदेश के पर्यटक खींचे चले आते हैं. तो आइए इस गली में उड़ रही परांठों की सोंधी-सोंधी खुशबू को ‘चखा’ जाए.

चांदनी चौक के सीसगंज गुरुद्वारे से आगे चलने पर बायीं ओर जाने वाली एक संकरी सी गली ही है परांठे वाली. पहले वहां एक दर्जन दुकानें हुआ करती थीं, अब मात्र चार ही रह गई हैं. एक दुकान के मालिक अभिषेक दीक्षित बताते हैं कि उनके पूर्वजों में से एक पंडित घासीराम ने वर्ष 1870 में इस गली में परांठे बेचना शुरू किया था. उसके बाद वहां दुकानें बढ़ती चली गईं. वैसे तो इस गली का नाम दरीबा खुर्द था, लेकिन परांठों के चलते साल 1911 में इसका नाम बदल दिया गया. चूंकि यह इलाका मुगलकाल से ही कारोबारी चरित्र का रहा है, इसलिए पुराने दौर में दुकानों में आलू, दाल और सादा परांठे ही मिलते थे. लेकिन अब टूरिस्टों आदि के आने से दुकानों में करीब 25 किस्म के परांठे मिलते हैं.

दिल्ली की परांठे वाली गली में 25 किस्म के पराठें मिलते हैं.

परांठों के नाम सुनेंगे तो हैरत के साथ-साथ मुंह में पानी आने लगेगा. दुकानों में मेवा व खुरचन रबडी के मीठे परांठे सहित टमाटर, पुदीना, नींबू, मिर्च, आलू, दाल, गोभी, मिक्स, करेला, काजू, पनीर, भिंडी, गाजर, मटर, पापड़ और परत परांठे मिलते हैं. ध्यान रखिए कि इन दुकानों में परांठा सेंका नहीं बल्कि तवे के बजाय कड़ाही के अंदर देसी घी में तला जाता है और उसका साइज आम परांठो से छोटा होता है. इन दुकानों में परांठों के साथ अमूमन तीन सब्जी, सीताफल, आलू छोले व आलू मैथी की सब्जी के अलावा केले व पुदीने की चटनी के साथ मिक्स अचार सर्व किया जाता है. परांठों की कीमत 70 से 100 रुपये के बीच है.

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इन परांठों और सब्जी में प्याज व लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता. पराठों की दुकानों में एक ही थाली में पारंपरिक तरीके से सब्जी, परांठे, अचार और चटनी परोसी जाती है. दुकानें बहुत विशाल नहीं है. दो दुकानों में तो पुराने वक्त की पत्थर की सीटें ही बनी हुई हैं. लेकिन इतना तय है कि परांठो की इतनी वैरायटी शायद ही कहीं मिले.

नजदीक मेट्रो स्टेशन: चांदनी चौक



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