गुलाबो की गमक पर निहाल सारी दुनिया

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रेतीले बवंडरों और तपिश भरी वादियों में भी तहज़ीब के गुल खिलाये जा सकते हैं. यकीन करना ज़रा कठिन है, लेकिन राजस्थान की सरज़मीं पर वक्त की स्याही ने एक ऐसी हकीकत भरी दास्तान लिखी है जिसे सुनकर सारी दुनिया आज चकित है. ये है गुलाबो की कहानी. यानी एक ऐसी औरत की कहानी जिसने अपनी बलखाती देह में लय-ताल का ऐसा तिलिस्म रचा जो रंगीले राजस्थान को नई नज़र से देखने के लिए विवश कर देता है. ये वही गुलाबो बाई है जो साँपों को पालकर, उनका खेल दिखाकर उन्हीं के ज़रिये सदियों से अपनी रोज़ी की जुगाड़ करने वाली बिरादरी की नुमाइंदगी करती है. यायावर सपेरों के खानदान की यह बेटी कला के रंगमंच पर एक दिन सितारा बनकर उभरेगी, यह सिर्फ उसकी किस्मत को मालूम था. इस सच पर सुखद आश्चर्य और गर्व होता है कि कभी गुमनामी के अंधेरों में गुजर करने वाली गुलाबो के नाम के साथ पांच बरस पहले पद्मश्री की मानद उपाधि का तमगा जुड़ गया है.

यही नहीं, गुलाबो के साथ जुड़ा कालबेलिया नृत्य यूनेस्को द्वारा नामित विश्व धरोहर की सूची में दर्ज हो चुका है. हाल ही मशहूर लोक गायिका मालिनी अवस्थी द्वारा स्थापित लोकनिर्मला सम्मान से गुलाबो बाई लखनऊ में अलंकृत की गयी. बेशुमार दुश्वारियों और हिकारत के लम्बे दौर गुज़ारकर क़ामयाबी और शोहरत की बुलंदियों को छूने वाली इस जाबांज और धुनि कलाकार की संघर्ष यात्रा पर पिछले दिनों राजभाषा रूपाम्बरा पत्रिका ने लंबा शोध-अध्ययन प्रकाशित किया था. चंद्रदीप हाड़ा से हुए लम्बे वार्तालाप में गुलाबो ने बहुत से उन अनजाने पहलुओं और वाकयों को खुलासा किया जिन्हें जाने बगैर शायद इस नर्तकी की तस्वीर अधूरी है. बहरहाल, नागिन की तरह बलखाती हुई गुलाबो को नृत्य करते देखना दर्शकों के लिए सदा एक अलौकिक अनुभव रहा है.

अपनी दास्तान सुनाते हुए गुलाबो विचित्र बात साझा करती हैं- साँपों का खेल दिखाने के दौरान गाँव की औरतें जो दूध साँपों को पिलाती उसमें से बचा हुआ दूध पिताजी मुझे पिला देते थे और इसी बीच पिताजी के साथ गाँव-गाँव घूमते-घूमते मैं बड़ी हो गयी. एक बार मेरी माँ ने मेरे पिताजी से पूछा कि मेरी बच्ची का पेट आप कैसे भरते हैं क्योंकि अभी यह खाना तो खा नहीं सकती? तो मेरे पिताजी ने कहा कि गाँव की औरतें साँपों को जो दूध पिलाती हैं उसमें से बचा हुआ दूध मैं इसे पिला देता हूँ. जब मैं ढाई साल की हुई उस समय जब बीन बजता, ढपली बजती थी तो मैं भी नाचने लग जाती थी. कभी साँपों को गले में पहन लेती थी, कभी उनके ऊपर गिर जाती थी. कभी साँपों को लेकर मैं गिर जाती, जिस प्रकार भाई बहनों के साथ खेलकूद कर बच्चे बड़े होते हैं, मैं साँपों के साथ नाचते-नाचते बड़ी हो गयी. मैं मानती हूँ कि सांप ही मेरे गुरु हैं और उन्हीं से मुझे इस नृत्य की प्रेरणा मिली है.

यह नृत्य भगवान के द्वारा मुझे दिया गया एक उपहार है. जब मैं अच्छा नृत्य करने लगी तो मेरे पिताजी को रुपये, आटा, अनाज और अन्य सामग्री आसानी से मिल जाय करती थी. यह देखकर मेरे समाज के लोग मेरे पिताजी से नाराज़ रहने लग गए थे और कहने लगे कि बेटी को नचा रहा है, साँपों को नहीं नचाता. इस बीच समाज का काफी विरोध मेरे पिता को सहना पड़ा था. इसके बाद मेरे पिता मुझे घर पर छोड़ने लगे लेकिन मुझे तो नाचने की लत लग चुकी थी और जब मुझे नाचने को नहीं मिला तो एक बार मैं बहुत बीमार हो गयी थी और जब मेरे पिता डॉक्टर के पास ले गए तो डॉक्टर ने कहा- यह लड़की अब बचेगी नहीं इसे तो आप घर ले जाओ.

मेरे पिताजी मुझे घर लेकर नहीं आये और सीधा मुझे अजमेर ख्वाजा शरीफ के यहाँ ले गए और उनकी चौखट पर उन्होंने कहा – हे पीर बाबा, मेरी धरती पर यह बच्ची जन्मी है. पांच घंटे यह बच्ची धरती के अंदर रहने के बाद भी नहीं मरी तो छोटी-सी बीमारी से यह कैसे मर सकती है, तब बाबा के सामने हाथ जोड़ कर मेरे पापा बैठ गए. उस समय मेरे हाथ-पाँव भी नहीं चल रहे थे. इसी बीच पीर बाबा की मज़ार से एक गुलाब का फूल आकर मेरे ऊपर गिरा तो मैं हाथ-पैर चलाने लगी, रोने लगी. मेरे पास ही मौलाना साहब खड़े थे, उन्होंने कहा- तेरी बेटी वापस ज़िंदा हो गयी है बाबा. तब मेरे पिता ने मौलाना साहब से कहा- आज यहाँ धनवंती ख़त्म हो गयी और गुलाब को मैं यहाँ से लेकर जा रहा हूँ और तभी से मेरा नाम गुलाब पड़ गया.

अपनी दास्तान सुनाते हुए गुलाबो बताती हैं कि – अब कालबेलिया नृत्य जो मेरे द्वारा शुरू हुआ वो तो हम देश-विदेशों में जा कर प्रदर्शन करने लगे हैं लेकिन आज न तो कोई हाथ से पुंगी बनता है न ही हाथ से ढपली बनाता है, न ही चंग बनाता है. पहले हम लोग पारम्परिक साज़ों पर ही नाचते थे. आजकल ढोलक नगाड़ा, हारमोनियम, सिंथेसाइज़र आदि साज़ भी इसमें शामिल हो गए हैं. इसी वजह से हमसे समाज के युवक आज पीछे रह गए हैं जबकि लड़कियां कहीं आगे निकल गयी हैं. आज हमारे समुदाय की कई लड़कियां इस नृत्य को देश-विदेशों में प्रस्तुत कर रही हैं.

विदेशी लड़कियाँ यहाँ हमारे पास कालबेलिया नृत्य सीखने के लिए आ रही हैं. आज इस नृत्य का प्रचार-प्रसार बहुत हो रहा है. हमारे समाज के युवक न तो बीन, ढपली, चंग बनाते हैं और न ही सीखना चाहते हैं. इसलिए हमारी पारम्परिक कला पिछड़ती जा रही है. आजकल हमारे समुदाय के अधिकतर लोग शहरों में रहने लगे हैं. उन्हें यहाँ बहुत सुविधाएं मिल रही हैं. इसलिए अब जंगलों में जाना नहीं होता. पहले जब हमें कार्यक्रम मिलते थे तो हमारे समाज के लड़के-लड़कियाँ ही कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुतियां देते थे. पहले हमारे पारम्परिक साज़ों की ज़रुरत रहती थी जो आज कम हो गयी है.गुलाबो बताती हैं कि हमारी कला पर आधारित कई डाक्यूमेंट्री फिल्में बनी हैं जिससे हमारी कला का प्रचार-प्रसार घर-घर में हुआ है और वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा मुझे पद्मश्री सम्मान से अलंकृत करके हमारी इस लोक कला को अमर बना दिया है. सरकारी कार्यक्रमों में शुरू से ही इस नृत्य की प्रस्तुति को अंत में रखा जाता है. इसके बारे में गुलाबो सपेरा ने बताया कि, पहले मैं समझ ही नहीं पाती थी कि सरकार के कार्यक्रमों में मेरा नाच सबसे आखिर में क्यों रखा जाता है. मैंने कई बार कहा भी कि मेरा डांस पहले करवाएं तो इस पर मुझे कहा गया कि लोग तुम्हारे इंतज़ार में पूरे कार्यक्रम तक बैठे रहते हैं. इस बीच वे अनाउंस करते रहते हैं कि, कालबेलिया नृत्य की प्रस्तुति आपके लिए जल्दी ही की जाएगी तथा तुम्हारा नृत्य इतना ऊर्जावान और तेज़ है कि तुम्हारे नृत्य को देखने के बाद दूसरा कोई नृत्य जमता ही नहीं है. सबको इतना अच्छा लगता है कि यह नृत्य ही दिमाग में छाया रहता है.

सबको नचा देता है यह नृत्य. तुम्हारा यह नृत्य एक ऐसे मार्ग पर ले जाता है जहाँ 15 से 20 मिनट तक लोगों को एक अलग ही दुनिया मिलती है. जो लोग यह नृत्य देखने आते हैं वो अक्सर यह कहते हैं कि इस नृत्य के साथ-साथ हम भी सफर कर रहे थे , इस बीच इन 15 से 20 मिनट में हम कहाँ जा रहे थे हमें खुद को भी पता नहीं है. ऐसा लग रहा था जन्नत में हैं हम लोग. हम एक नयी दुनिया में आ जाते हैं. सारे दुःख-तकलीफ भूल कर हम इस नृत्य में खो जाते हैं और हमें एक नयी ऊर्जा मिल जाती है. आगे गुलाबो सपेरा जोड़ती हैं कि फ्रांस में परवीन नाम की एक लड़की है जो आज बहुत बड़ी गायिका बन चुकी है, वो जब तक मेरा गाना सुन नहीं लेती थी रात को सोती नहीं थी. इसी प्रकार फ्रांस और अन्य देशों के बच्चे इस समुदाय के गीत-संगीत को बहुत पसंद करते हैं. एक बार एक छात्रा गुलाबो सपेरा का नृत्य देखने 600 किलोमीटर की सड़क यात्रा करके पहुंची थी. इस सात साल की बच्ची ने गुलाबो सपेरा को एक अंगूठी दी थी जो आज तक उन्होंने पहनी हुई है. इस नृत्य के मुख्य दर्शक बच्चे और बुज़ुर्ग लोग हैं जिन्हें यह नृत्य देख कर सबसे ज़्यादा ऊर्जा मिलती है.

गुलाबो सपेरा ने कहा कि आज मैं यह नहीं बता सकती कि मैंने कितने हाउस फुल शोज किये हैं. वर्ष 2016 में संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली के द्वारा संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से आयोजित अमूर्त धरोहर-ऐ-फेस्टिवल ऑफ़ इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज ऑफ़ इंडिया कार्यक्रम में 26 मार्च को गुलाबो सपेरा के दल द्वारा कालबेलिया नृत्य की यादगार प्रस्तुति की गयी थी. गुलाबो गर्व के साथ बताती हैं कि एक रंगमंच स्कॉलर के रूप में मैंने भी राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया था. इस प्रस्तुति के दौरान मैंने भी साक्षात् देखा था कि पूरे अकादमी परिसर के लोगों ने इस नृत्य का आनंद लिया था. एक बार झुंझुनू में आयोजित कार्यक्रम को देखने हज़ारों की तादाद में दर्शक इकठ्ठा हो गए थे.

हालत यह हो गयी थी कि गुलाबो सपेरा का नृत्य देखने के लिए लोगों ने अपना संतुलन तक खो दिया था. इस बीच बड़ी मुश्किल से लोगों को काबू में किया गया था. दूसरे दिन कई लोगों ने गुलाबो की सही सलामती जानने के लिए उनसे बात की तब उन्हें पता चला कि कार्यक्रम में कई लोग घायल हो गए थे. आज स्थिति यह है कि किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में यदि दर्शकों की भीड़ इकठ्ठा करना होता है तो गुलाबो सपेरा का नृत्य उस कार्यक्रम में शामिल किया जाता है. अभी तक गुलाबो सपेरा के जितने भी कार्यक्रम हुए हैं उनमें अटाटूट उमड़ती दर्शकों की भीड़ यह साबित करती है कि गुलाबो कि गामक पर सारा जहां निहाल है.(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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