कोरोना के कारण नहीं होगा राहुल गांधी का बर्थडे सेलिब्रेशन, कार्यकर्ताओं को दिया ये टास्क

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नई दिल्ली. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अपना 51वां जन्मदिन (Rahul Gandhi Birthday) कोरोना वायरस की दूसरी लहर (Coronavirus Second Wave) के चलते नहीं मनाएंगे. राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से केक कटिंग न करने, पोस्टर बैनर न लगाने और जश्न न मनाने की अपील की है. राहुल ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे उनके जन्मदिन के मौके पर कोरोना काल में संकट में फंसे लोगों की मदद करें. राहुल की अपील के बाद पार्टी ने देशभर में लोगों के बीच मास्क, सैनेटाइजर, कोरोना किट बांटने का फैसला किया है. तो वहीं, यूथ कांग्रेस दिल्ली के रेड लाइट इलाके में सेक्स वर्कर्स को फ्री वैक्सीन लगवाने का कैम्प लगाएगी और छात्र संगठन NSUI ,छात्रों के लिए फ्री वैक्सीन कैम्प लगाएगी.

राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों में नेताओं के बीच अंतर कलह को खत्म करना होगा. गिने-चुने राज्य ही हैं जहां कांग्रेस की सरकार है और अगर यह नेता आपस में इसी तरह लड़ते रहे तो अगले चुनाव में वहां से भी पार्टी का पत्ता साफ हो सकता है. यही वजह है कि राहुल गांधी को जल्द और निर्णायक कदम उठाकर दोनों प्रदेशों में मचे झगड़े को खत्म करना होगा.

राहुल के सामने हैं कई चुनौतियां

51 साल के हो चुके राहुल के सामने चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है. पिछले कुछ सालों से कांग्रेस पार्टी न सिर्फ कमजोर हुई है बल्कि पार्टी में विघटन भी बढ़ा है. कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. हेमंत विश्व शर्मा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद बीजेपी में जा चुके हैं. अशोक तंवर ने अपना अलग संगठन खड़ा किया है. कई असंतुष्ट नेता विकल्प की तलाश में है. इस वक़्त कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखने की है.एक तरफ असंतुष्ट 23 नेताओं ने G 23 नाम का ग्रुप बनाया है जो न सिर्फ नेतृत्व पर सवाल खड़ा करता है बल्कि उनकी कार्यशैली पर भी सवाल पूछता है. G23 के नेता कांग्रेस नेतृत्व को सक्रिय और सड़क पर देखना चाहते हैं. राहुल गांधी अक्सर देश के दौरे करते हैं ,हर चुनाव में मेहनत करते हैं, लगातार पसीना बहाते हैं  लेकिन नतीजा पक्ष में नहीं आता और यही वजह है यह नेता उन पर हमला करने का मौका पा जाते हैं. हालांकि बीच में राजस्थान छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सरकार बनने के बाद पार्टी में राहुल की स्थिति काफी मजबूत हुई थी. राहुल गांधी को पार्टी में अपनी स्वीकार्यता और ज़्यादा बढ़ानी होगी.

पार्टी के अलावा विपक्षी दलों के बीच भी राहुल गांधी को सामंजस्य और स्वीकार्यता बढ़ाने पर काम करना होगा. ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे नेता राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की कुर्सी के बीच सबसे बड़ा रोड़ा हैं. जाहिर सी बात है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते विपक्ष के सभी दलों को साथ लेकर चलने की कला ही राहुल गांधी को उस कुर्सी से तक पहुंचा सकती है.

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यूपी पर फोकस करना है सबसे जरूरी

कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है लेकिन उत्तर प्रदेश में पार्टी की हालत बेहद खराब है. पार्टी ने मुस्लिम और दलित मतदाताओं पर पिछले कुछ दिनों में पूरा फोकस रखा है और जानकार कहते हैं कि यही दाव कांग्रेस ने गलत लगा दिया है. जानकार कहते हैं कि मुस्लिम मतदाता उसी पार्टी के साथ जाता है जिसके पास वोट बैंक हो और जो बीजेपी को हराने की क्षमता रखता हो.

फिलहाल उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी यादव वोट बैंक के सहारे मुसलमानों का साथ लेकर बीजेपी से लड़ने की क्षमता रखती है. कांग्रेस के पास कोई अपना वोट बैंक नहीं है और इसलिए मुसलमान कांग्रेस के साथ जाएंगे इस बात को पक्का नहीं माना जा सकता. दलित बहुजन समाज पार्टी के साथ ही रहते हैं. ऐसे में राहुल गांधी को कांग्रेस की यूपी में रणनीति बदलनी होगी ताकि पार्टी पिछले प्रदर्शनों से आगे जा सके. मौजूदा हालात में उत्तर प्रदेश में पार्टी के मजबूत होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

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राहुल गांधी के सामने संगठन के चुनाव करवा खुद की निर्णायक भूमिका के बारे में भी फैसला लेना होगा. कुछ नेता मानते हैं कि 2024 में मोदी की चुनौती से निपटने के लिए राहुल को खुद कमान संभालनी होगी. फिलहाल पार्टी अनिर्णय की स्थिति में है और सोनिया गांधी के सहारे ही काम चला रही है. कामचलाऊ चेहरे के साथ 2024 जैसी बड़ी जंग नहीं जीती जा सकती इसलिए राहुल को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी. कांग्रेस के नेता दबी जुबान से कहते हैं फैसले सारे राहुल गांधी ही लेते हैं लेकिन जिम्मेदारी से बचते हैं, उनको खुलकर सामने आना चाहिए. हालांकि राहुल पहले अध्यक्ष का पद संभाल चुके हैं और दोबारा भी संभालने को तैयार हैं , इस तरह के संकेत उनके करीबी लोग देते रहे हैं. फैसला जो भी हो, जल्दी होना चाहिए.

राहुल गांधी को अहमद पटेल, राजीव सातव, मोतीलाल वोरा जैसे सक्षम और अनुभवी नेताओं की कमी भी पूरी करनी होगी.इन नेताओं का देहांत हो चुका है. राहुल गांधी को संगठन में इन नेताओं की भूमिका अदा करने के लिए नए नेताओं का चुनाव करना होगा.

कुछ ही नेताओं को सब कुछ सौप देने की राहुल के फैसलों से भी कांग्रेसमें कई नेता नाराज हैं. राहुल के आस-पास के सी वेणुगोपाल, भंवर जितेंद्र सिंह और शक्ति सिंह गोहिल जैसे कम उम्र और अनुभव वाले नेताओं को ज़्यादा तवज़्ज़ो देने से भी पार्टी के कई चेहरे नाराज़ हैं. राहुल को अनुभव और युवा दोनों का सामंजस्य बना कर संगठन चलाना होगा.

काफी वक्त के बाद सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया है. ऐसे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि अब राहुल गांधी, सोनिया गांधी के साथ मिलकर लंबित मामलों में तेजी से फैसले करेंगे ताकि पार्टी की सेहत सुधर सके.



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