आधुनिक उर्दू कविता की खूबियां जानने-समझने के लिए जरूरी किताब ‘हमसफ़रों के दरमियां’

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उर्दू के शायर और नाटककार शमीम हनफ़ी की किताब ‘हमसफ़रों के दरमियां’ आधुनिक उर्दू कविता के बारे में उनके आकलन को पेश करने वाली प्रतिनिधि कृति मानी जा सकती है.

समकालीन साहित्य और उससे जुड़े मसले शमीम साहब के सोच और दिलचस्पी का ख़ास विषय रहे हैं. वह इस संबंध में, उर्दू साहित्य को आधार बनाकर, लगातार लिखकर अपना नजरिया रखते रहे. आधुनिक उर्दू कविता पर विचार करते हुए उन्होंने 19वीं सदी और 20वीं सदी के बहुत से शायरों को अपने आलोचनात्मक अध्ययन के दायरे में शामिल किया है. इस तरह ‘हमसफ़रों के दरमियां’ ग़ालिब, जिन्हें वे उर्दू का आख़िरी क्लासिकी और पहला आधुनिक शायर मानते हैं, से लेकर आज तक की शायरी उनके आलोचनात्मक अध्ययन का विषय बनी है.

पिछले पचास-साठ बरसों के अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने इस विषय पर कम से कम साठ-सत्तर निबंध लिखे. उनमें से अधिकतर उर्दू में छपी उनकी दो आलोचना पुस्तकों ‘हमसफ़रों के दरमियां’ और ‘हमनफ़सों की बज़्म में’ संकलित हैं. उर्दू साहित्य, खासकर आधुनिक उर्दू कविता की जमीन और विशेषताओं को जानने परखने के संदर्भ में इन किताबों को निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ माना जा चुका है.

‘हमसफ़रों के दरमियां’ में इक़बाल, फ़ैज़, राशिद, मीराजी, अख्तरुल ईमान, अली सरदार जाफ़री, फ़िराक़ गोरखपुरी, अमीक़ हनफ़ी, क़ाज़ी सलीम, किश्वर नाहीद, कुमार पाशी, बलराज कोमल, मनमोहन तल्ख़, महमूद अयाज़, मुनीर नियाज़ी, शहरयार, बाक़र मेहदी और मुहम्मद अलवी के बहने समूची आधुनिक उर्दू कविता का विश्लेषण देखा जा सकता है.

शमीम साहब ने जिस नजरिये से इन शायरों और उनकी शायरी पर विचार किया है, वह पारम्परिक प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद की बहु प्रचारित मान्यताओं को जस का तस अपनाकर नहीं बनी है. उन्होंने जोर देकर कहा है कि ‘हमारी अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परम्परा के सन्दर्भ में ही हमारे अपने प्रगतिवाद, आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकता की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए. उनका कहना है कि वे भारतीय जनजीवन को उसके समय के पश्चिमी जीवन और सोच-समझ की नकल नहीं मानते. जिस तरह हमारा सौन्दर्यशास्त्र या सौन्दर्य संस्कृति अलग है उसी तरह हमारा प्रगतिवाद और आधुनिकता भी अलग है. इसलिए अपने आधुनिक शायरों के कृतित्व को परखने की कसौटी भी अलग होगी.

शमीम हनफ़ी ने शायरों के स्वभाव, चरित्र, चेतना और रूप-रंग की भिन्नता को रेखांकित करते हुए प्रस्तावित किया है कि उर्दू कविता के संदर्भ में आधुनिकतावाद को इसी भिन्नता और बहुलता का प्रतीक होना चाहिए.

इस किताब से न केवल आधुनिक उर्दू कविता की आलोचनात्मक जानकारी मिलती है बल्कि इसके अनेक शायरों की शायरी पढ़ने का आनंद भी मिलता है.

पुस्तक और लेखक के बारे में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी लिखते हैं, ‘शमीम हनीफ़ खुद शायर होने के अलावा एक बड़े आलोचक के रूप में उर्दू में बहुमान्य हैं. उनके कुछ निबंधों को इस पुस्तक के माध्यम से उर्दू की आधुनिक कविता की कई जटिलताओं, तनावों और सूक्ष्मताओं को जान सकेंगे और कई बड़े उर्दू शायरों की रचनाओं का हमारा रसास्वादन गहरा होगा.’

पुस्तक: हमसफ़रों के दरमियां
लेखक : शमीम हनफ़ी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
अनुवादक : शुभम मिश्र
भाषा – हिंदी
कीमत : हार्डबाउंड – 795/- पेपरबैक – 299/-



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